इस्लाम के प्रतिष्ठित विद्वान रहे काज़ी साहब को हज़ारों ने दी नम आंखों से बिदाई

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इन्दौर Updated On :

महू। देश में इस्लाम धर्म के सबसे प्रतिष्ठित लोगों में शुमार शहर काजी हजरत शेख मोलाना इब्राहिम कासमी का  92 साल की उम्र में इंतकाल हो गया।

रविवार को उनकी आख़िरी यात्रा में देश के अलग-अलग राज्यों से हज़ारों लोग शामिल हुए थे। महू के रहने वाले काज़ी साहब इस्लाम धर्म के बड़े स्कॉलर थे। जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका सहित खाड़ी देशों में भी काम किया।

कनाडा, इंग्लैंड जैसे पश्चिमी देशों में भी उनके कई अनुयायी हैं जो उनके जाने के बाद लगातार परिवार के संपर्क में हैं।

हजरत शेख मोलाना इब्राहिम कासमी

काज़ी साहब के इंतकाल की ख़बर सुनने के बाद महू शहर में लोगों का आना शुरु हो गया और दोपहर तक शहर में करीब आठ से दस हजार लोग जमा हो गए।

इनमें इंदौर-महू के अलावा उज्जैन, भोपाल, देवास, रतलाम और महाराष्ट्र, गुजरात, केरल, उप्र तक से लोग पहुंचे थे। लोगों को इंतजार में तय कार्यक्रम में कुछ देरी भी की गई।

महू में रविवार को काज़ी साहब के जनाज़े में पहुंचे हजारों लोग

उनके जनाजे को महू शहर में उनके निवास बंडा बस्ती से एक वाहन में लाया गया और आधे रास्ते के बाद लोगों ने कांधा देना शुरू किया। उनके अंतिम दर्शन करने तथा कांधा देने के लिए होड़ लगी हुई थी।

इस भीड़ को देखते हुए पुलिस को भी अतिरिक्त इंतज़ाम करने पड़े और महू व किशनगंज थाने का पुलिस बल तैनात यातायात संभालने के लिए तैनात किया गया।

छावनी परिषद के नाके से  वाहनों का आवागमन मोड़ दिया गया लेकिन भीड़ इतनी ज्यादा थी कि कुछ देर तक यातायात रोकना भी पड़ा। इसके चलते किशनगंज क्षेत्र में बड़ा जाम लगता रहा।

शहर काजी कासमी साहब ने बीस वर्ष की उम्र से ही  गुजरात के डाबेल मदरसे में पढ़ना शुरू किया था।  इसके बाद वे देवबंद में मौलवी रहे। जीवन के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने इस्लाम धर्म की गहरी समझ हो चुकी थी और इसके बाद उनकी विद्वता को दुनिया ने भी माना।

उनका अधिकांश समय गुजरात के अलावा सउदी अरब, दक्षिण अफ्रीका सहीत अन्य देशों में इस्लाम धर्म की शिक्षा देने में गुजरा। वे वर्ष 2001 में महू के शहर काजी बने। इस दौरान वे  वेतन भी नहीं लेते थे।

काज़ी साहब का रहन सहन भी बेहद साधारण था तमाम शोहरत के बाद भी वे बेहद सामान्य जीवन जीते थे और आखिरी सांस तक वे बस्ती के अपने छोटे से घर में ही रहे।

उनके बेटे के मुताबिक उनके जाने के बाद उनकी हर बात जीवन के लिए एक सीख है। इनमें सबसे अहम जीवन को सरलता से जीने और अभिमान न करने का फलसफा है। जो उन्हें हर दम याद रहेगा।

इसके बाद विदेशों में उनकी व्यस्तताएं बढ़ती रहीं और उन्होंने महू में अपनी जिम्मेदारी अपने बेटे मुफ्ती मोहम्मद जाबिर साहब को दे दी थी। उनके अंतिम दर्शनों करने कांग्रेस के कुछ नेता भी पहुंचे।

इनमें  पूर्व विधायक अंतरसिंह दरबार, कैलाश दत्त पांडे, विजय नौलखा आदि शामिल थे।