Vijay Diwas 2020: पहली बार बने सेना के ट्रांसपोर्ट कॉलम का महू के कर्नल दिलीप घोष ने किया था नेतृत्व


1939 में महू में जन्मे हंसमुख मिज़ाज़ के अत्यंत लोकप्रिय स्वर्गीय कर्नल दिलीप कुमार घोष (विशिष्ट सेवा मेडल) ने बांग्लादेश युद्ध में एक अहम भूमिका निभायी थी।


dev kumar vasudevan देव कुमार वासुदेवन
इन्दौर Updated On :
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कर्नल दिलीप कुमार घोष व पत्नी श्रीमती रेखा घोष


इंदौर। 1939 में महू में जन्मे हंसमुख मिज़ाज़ के अत्यंत लोकप्रिय स्वर्गीय कर्नल दिलीप कुमार घोष (विशिष्ट सेवा मेडल) ने बांग्लादेश युद्ध में एक अहम भूमिका निभायी थी।

फरवरी 1964 में भारतीय सेना के संचार विभाग कोर ऑफ़ सिग्नल्स में उन्होंने कमीशन प्राप्त किया और कुछ वर्षों के बाद वे आर्मी सर्विस कोर में ले लिए गये। सेना की अग्रिम पंक्तियों तक राशन, कपड़े और असलहा पहुंचाना सर्विस कोर की ज़िम्मेदारी होती है।

उन्होंने 1965 के भारत पाक यद्ध में बतौर एक सिग्नल अफसर भाग लिया था। पिछले कई वर्षों से दिसंबर माह में घोष साहब और मैं उनके 1971 के युद्ध में पूर्वी सीमा के अनुभवों पर लम्बी बातें किया करते थे और मैंने उनके इन अनुभवों पर कई लेख भी लिखे।

2019 मई में उनके देहांत के बाद हमारा यह वार्षिक डिस्कशन रुक गया। इस साल मैंने उनकी पत्नी श्रीमती रेखा घोष से बात की और घोष साहब को याद करते हम दोनों की आंखें छलक गयीं।

घोष दम्पति से मेरी लम्बी बातचीत के कई दौर से मुझे दिलीप जी के बांग्लादेश के जन्म में बहुमूल्य योगदान की बारीकियों को जानने का मौका मिला। उसका सारांश नीचे प्रस्तुत कर रहा हूं।

कर्नल घोष के अनुसार 1971 के युद्ध में विजय के मुख्य कारण थे – भारत और बांग्लादेश के सैनिकों की वीरता और जनरल मानेकशॉ एवं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का कुशल नेतृत्व।

1971 में वे एक कप्तान थे और बॉम्बे (मुंबई) में उनकी पोस्टिंग थी। रेडियो बांग्लादेश पर प्रसारित देशभक्ति के गीत एवं मुजीबुर रहमान के भाषणों से वे बहुत प्रेरित हुए थे। पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों पर पाकिस्तानी सेना द्वारा किये गए अत्याचार एवं नरसंहार के खबरों से वे बहुत दुखी और आक्रोशित थे।

पत्नी व नन्ही बेटी को छोड़कर हो गए थे कलकत्ता रवाना – 

जुलाई 1971 में उनकी पोस्टिंग पूर्वी कमांड के X फोर्स में हो गयी और उन्हें 48 घंटों में कलकत्ता पहुंचने का आदेश मिला। अपनी पत्नी रेखा और नन्ही बेटी सुमिता को बॉम्बे के कोलाबा छावनी में सरकारी फ्लैट में छोड़कर वे कलकत्ता के लिए रवाना हो गए।

रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर जब लोकल ट्रेन से रोज़ सफर करने वाले नौकरीपेशा वाले लोगों ने बड़ी संख्या में फौजियों को देखा तो उनमें से कई ने आकर कारण पूछा और दिलीप घोष को शुभकामनाएं दी और “भारत माता की जय” के नारे लगाए।

बांग्ला भाषी अफसरों व सैनिकों को इसलिए चुना गया था – 

उनके विभाग ने खासकर बंगाली अफसरों और सैनिकों को इस कार्य के लिए चुना ताकि भाषा की समस्या कम से कम हो और बांग्लादेश के स्थानीय लोगों का सहयोग भी अधिक आसानी से प्राप्त हो जाये।

कलकत्ता में पूर्वी कमान के मुख्यालय फोर्ट विलियम पहुंचने के बाद घोष को एक ट्रांसपोर्ट कंपनी का सेकंड इन कमांड और एडजुटेंट बनाया गया। भारत के राष्ट्रपति के द्वारा अध्यादेश जारी करने के बाद सिविल के लगभग 1000 लॉरी एवं ट्रकों को ड्राइवर सहित फौजी ड्यूटी के लिए ले लिया गया।

इस कार्य में उन्हें पुलिस और आरटीओ विभाग के साथ काम करना पड़ा। इन वाहनों की मदद से थल और वायु सेना को गोला बारूद और अन्य ज़रूरी सामान पहुंचाया जाने लगा। घोष ने खुलना और जेस्सोर शहरों से यह सारे कार्य किये।

घायल पाकिस्तानी फौजियों को भी पहुंचाया था अस्पताल – 

घायल सैनिकों को इन्ही वाहनों से कलकत्ता के अस्पतालों में पहुंचाया गया। इसमें पाकिस्तानी घायल फौजी भी थे। 16 दिसंबर को पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के बाद घोष ने हवाई जहाज़ से दुश्मन के घायल सिपाहियों को उपचार के लिए कोलकता पहुंचाया।

युद्ध की समाप्ति के बाद ट्रांसपोर्ट कॉलम को बंद कर दिया गया और सारे निजी वाहन मालिकों को लौटा दिए गए।

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युद्ध के बाद कोलकता में कर्नल (तब कप्तान) दिलीप कुमार घोष पूर्वी कमान के सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोरा से मिलते हुए।

जब ले. जनरल निआजी के लिए खाली करना पड़ा था कमरा – 

चूंकि पश्चिमी सीमा पर युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ था और घोष की पोस्टिंग उत्तरी कमान के एक डिवीज़न में हो गया। जाने से एक दिन पहले एक दिलचस्प घटना हुई जब कोलकता में उन्हें आदेश मिला कि अफसर मेस में वे अपना कमरा खाली कर दें।

बाद में उन्हें पता चला कि उनके कमरे में पाकिस्तानी सेना के पूर्वी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल अमीर अब्दुल्लाह खान निआज़ी को ठहराया गया था। बाद में उन्हें जबलपुर में एक युद्ध बंदी कैंप में भेज दिया गया था।

हफ्ते-दस दिन में हो पाती थी थोड़ी-बहुत बातः पत्नी रेखा घोष

उन दिनों के बारे में श्रीमती रेखा घोष बताती हैं कि बहुत मुश्किल समय था। चिट्ठियां बहुत देर से आते थे और फ़ोन करना उतना आसान नहीं था। एक और अफसर के घर में फ़ौज का फोन था और उस पर पूर्व निर्धारित दिन और समय पर हफ्ते-दस दिन में थोड़ी-बहुत बात हो जाती थी।

वे बताती हैं कि उसी बिल्डिंग में युद्ध में गए थल और जल सेना के कई अधिकारियों के परिवार रहते थे। उन्हीं में से एक नौसेना के आईएनएस खुकरी युद्धपोत में पदस्थ मेडिकल अफसर सर्जन लेफ्टिनेंट सुधांशु शेखर पांडा की पत्नी थी।

एकमात्र युद्धपोत जिसे दुश्मन ने डुबोया था – 

यह अब तक का एकमात्र भारतीय युद्धपोत है जिसे युद्ध में दुश्मन ने डुबोया है। इसे 9 दिसंबर को पाकिस्तान नौसेना के एक पनडुब्बी ने डुबो दिया था। उस जहाज़ के कप्तान सहित कई अफसर और नाविक उसके साथ ही डूब गए थे।

डॉक्टर पांडा लापता थे और तीन महीनों तक कोई खबर नहीं मिली, बाद में पता चला था कि वे भी शहीद हो गए हैं। इस खबर से सभी परिवारों में मातम छा गया था। डॉ. पांडा को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

1988 में किया गया था विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित – 

1995 में फ़ौज से रिटायर होने से पहले 1988 में कर्नल दिलीप कुमार घोष को विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया था। यह उनको सियाचिन ग्लेशियर के बेस कैंप तक फौजी सामग्री शीघ्र पहुंचाने के लिए पुख्ता प्रणाली स्थापित करने के लिए मिला।

फ़ौज से रिटायर होने के बाद वे देवास के एक निजी कम्पनी में जनरल मैनेजर के पद पर पदस्थ थे। 2014 दिसंबर में बांग्लादेश सरकार ने उन्हें और 12 अन्य सैन्य अफसरों को पत्नियों के साथ बांग्लादेश आने का आमंत्रण दिया, जहां उनका सम्मान किया गया।

इस दौरान उन्हें 1971 के युद्धस्थलों पर भी ले जाया गया जहां उन्होंने पुरानी यादें ताज़ी कीं। मई 2019 में उनका देहांत हो गया पर महू के लोग आज भी उन्हें प्यार और आदर से याद करते हैं।