मैंने मेसी को खेलते हुए देखा है…


फुटबॉल से जुड़ी तमाम श्रेष्ठ उपलब्धियां मेसी के खाते में पहले ही दर्ज थीं। दुनिया के श्रेष्ठ फुटबॉलर का अवार्ड उन्हें रिकॉर्ड सात बार मिला है। अर्जेंटीना की तरफ से सर्वाधिक गोल दागने का खिताब मेसी के नाम है.


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अतिथि विचार Published On :

कल्लोल चक्रवर्ती.

विश्व कप में अर्जेंटीना की जीत लियोनेल मेसी के लिए सिर्फ एक उपलब्धि भर नहीं है। अर्जेंटीना को जीत दिलाकर वह माराडोना की बराबरी पर आ गए हैं। माराडोना भी अर्जेंटीना को दो बार विश्व कप के फाइनल में ले गए थे, जिसमें उन्हें एक बार जीत मिली।

मेसी भी अर्जेंटीना को दो बार विश्व कप के फाइनल में ले गए, जिसमें इस बार, अपने पांचवें और एलानिया आखिरी विश्व कप में, आखिरकार वह अपना सपना पूरा करने में सफल हुए। यह विश्व कप जीतकर पेले और माराडोना के साथ मेसी फुटबॉल के सर्वकालीन श्रेष्ठतम त्रयी का हिस्सा बन गए हैं।

फुटबॉल से जुड़ी तमाम श्रेष्ठ उपलब्धियां मेसी के खाते में पहले ही दर्ज थीं। दुनिया के श्रेष्ठ फुटबॉलर का अवार्ड उन्हें रिकॉर्ड सात बार मिला है। अर्जेंटीना की तरफ से सर्वाधिक गोल दागने का खिताब मेसी के नाम है, और पिछले ही साल कोपा अमेरिका कप में ब्राजील को हराकर अर्जेंटीना चैपियन बना था।

फीफा विश्व कप में अर्जेंटीना की तरफ से सर्वाधिक गोल करने का रिकॉर्ड भी मेसी के नाम है। लेकिन अभी तक उनके हाथ में सिर्फ विश्व कप की ट्रॉफी ही नहीं थी। लेकिन अब वह भी है।

हालांकि फाइनल में फ्रांस के तेईस साल के विस्फोटक एमबापे ने जब ताबड़तोड़ दो गोल ठोक दिए थे, तब एकबारगी ऐसा लगा था कि विश्व कप जीतने का मेसी का सपना शायद सपना ही रह जाएगा। लेकिन सिर्फ मेसी नहीं, सिर्फ उनकी टीम नहीं, केवल अर्जेंटीना नहीं, फुटबॉल विश्व का बहुत बड़ा हिस्सा इस बार मेसी के हाथ में विश्व कप की ट्रॉफी देखना चाहता था।

इस विश्व कप के तीन नायकों में से दो-क्रिस्टियानो रोनाल्डो और नेमार-विफल हो चुके थे। सिर्फ मेसी का जादू बचा था। न केवल उन्हें घेरने की कोई व्यूह रचना इस पूरे विश्व कप में कामयाब नहीं हुई, बल्कि ऐसा लगा कि अपना सर्वश्रेष्ठ खेल उन्होंने अपने आखिरी विश्व कप के लिए बचाकर रखा था। और सबसे बड़ी बात यह कि इस उपलब्धि ने मेसी को उस अर्जेंटीना का नायक बना दिया है, जहां वह पैदा जरूर हुए, लेकिन उस देश ने हमेशा उनकी राष्ट्रीयता पर संदेह किया

चौदह की उम्र में फुटबॉलर बनने के लिए अर्जेंटीना छोड़कर स्पेन चले जाने वाले मेसी को अर्जेंर्टीना के प्रति अपने प्रेम का बार-बार परिचय देना पड़ता था। हर हार पर मेसी की राष्ट्रीयता पर सवाल उठते थे।

आरोप लगते थे कि अर्जेंटीना से ज्यादा उन्हें स्पेन पसंद है, जहां वह खेलते हैं। उन पर आरोप लगते थे कि मैच से पहले वह राष्ट्रीय गीत नहीं गाते। अर्जेंटीना के एकाधिक पत्रकार उन्हें अतीत में अपमानित कर चुके हैं। दूसरे लोगों की छोड़िए, 2014 के विश्व कप फाइनल में हार के बाद मेसी के दादा ने टेलीविजन पर उन पर आलसी होने का आरोप लगाया था।

मर्दवादी अर्जेंटीना में, जहां आज भी महिला फुटबॉलर, मैच फीस और प्रतिष्ठा के लिए लड़ाई लड़ रही हैं, शालीन, अहिंसक और हंसमुख मेसी भीड़ को कभी पसंद नहीं आए। सैन्य वर्चस्व वाले अर्जेंटीना में करिश्माई, लेकिन विद्रोही, सनकी, नशेबाज, विपक्षी खिलाड़ियों से उलझने-झगड़ने वाले और औरतों का साहचर्य चाहने वाले माराडोना लोगों के प्रिय थे, अनुशासित मेसी नहीं। लेकिन अब मेसी कह सकते हैं कि वह भी अर्जेंटीना से उतना ही प्यार करते हैं, जितना माराडोना करते थे।

मैंने पेले को खेलते हुए नहीं देखा। उनकी सिर्फ एक स्मृति वर्ष 1977 की है, जब कॉसमॉस टीम के साथ वह मोहनबागान के साथ दोस्ताना मैच खेलने कलकत्ता आए थे और वह मैच 2-2 से ड्रॉ रहा था। पेले इकलौते खिलाड़ी हैं, जिन्हें कम्प्लीट फुटबॉलर कहा जाता है। दोनों पैरों की समान दक्षता, हेडर की क्षमता, गति, बुद्धि और मूव तैयार करना और फिटनेस-पेले में ये सारी चीजें थीं। और सर्वोपरि, उन्होंने ब्राजील को तीन बार विश्व कप दिलाया।

माराडोना अद्भुत प्लेमेकर और शानदार शिल्पकार थे। उनकी रफ्तार मुग्ध करती थी। विपक्ष को दबाव में रखने की क्षमता भी उनमें जबर्दस्त थी। फुटबॉल के आकाश में धूमकेतु की तरह छाए माराडोना ने 1986 लगभग अकेले ही अर्जेंटीना को चैंपियन बनाया था। और अगले विश्व कप में भी वह अर्जेंटीना को फाइनल तक ले गए थे।

1986 विश्व कप के क्वार्टर फाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ माराडोना के दो गोल फटबॉल के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेंगे। उसमें से पहला गोल हैंडलिंग फाउल था, जो ‘हैंड ऑफ गॉड’ के नाम से विख्यात (या कि कुख्यात!) है। जबकि दूसरा गोल फीफा विश्व कप के सबसे दर्शनीय गोलों में से था, जिसमें माराडोना ने 68 यार्ड तक इंग्लैंड के पांच फुटबॉलरों को अपनी ड्रिब्लिंग से छकाकर गोल किया था, और जिसे फीफा ने ‘गोल ऑफ द सेंचुरी’ का खिताब दिया था।

फुटबॉल विश्व कप के समूचे इतिहास में तमाम रोमांच एक तरफ और 1986 में इंग्लैंड के खिलाफ क्वार्टर फाइनल मैच में माराडोना का विस्फोटक खेल एक तरफ। इंग्लैंड और अर्जेंटीना के बीच फॉकलैंड युद्ध की पृष्ठभूमि में माराडोना के उस खेल ने उन्हें राष्ट्रनायक का दर्जा दे दिया था।

माराडोना की तरह मेसी भी एक शिल्पकार हैं। दूसरे खिलाड़ी फुटबॉल के पीछे-पीछे भागते हैं। मेसी ऐसा नहीं करते। दूसरे खिलाड़ी किक लेने और फुटबॉल पर कब्जे के लिए ताकत का इस्तेमाल करते हैं। मेसी ऐसा नहीं करते। बल्कि ऐसा लगता है कि खुद फुटबॉल धीरे-धीरे आकर उनके पैरों के पास आकर रुकता है।

छोटे कद का होने के कारण उनके लिए दिशा बदलना जितना आसान है, विरोधियों के टैकल्स से बचना भी उतना ही सहज है। पास देने और प्ले मेकिंग के मामले में वह विश्व के श्रेष्ठतम खिलाड़ी हैं। बार्सिलोना के पूर्व मैनेजर पेप गार्डिओला ने कभी कहा था कि मेसी फुटबॉल के बगैर जितना तेज दौड़ते हैं, फुटबॉल के साथ उससे कहीं ज्यादा तेजी से दौड़ते हैं!

माराडोना की तरह मेसी की ताकत भी बाएं पैर में है। हालांकि चलता तो मेसी का दाहिना पैर भी है, लेकिन मैच में दाहिने पैर की सक्रियता विपक्षी खिलाड़ियों को भ्रमित करने के लिए है। गोल पर अचूक निशाना दागने और साथियों को सटीक पास देने का काम उनके बाएं पैर के जिम्मे है।

मेसी को उनके सामने से टैक्ल करना असंभव है, ऐसा इस बार भी खासकर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच में दिखा, जब तीन ऑस्ट्रेलियाई डिफेंडरों के पैरों के बीच से मेसी के बायें पैर के धीमे शॉट से हुए गोल ने पूरे फुटबॉल विश्व को सम्मोहित किया।

ऐसे ही, सेमी फाइनल में क्रोएशिया के खिलाफ अर्जेंटीना के आखिरी गोल में मेसी ने अपने साथी यूलियन अलवरेस को जो पास बढ़ाया, वैसा पास देना किसी दूसरे खिलाड़ी से संभव नहीं था। मेसी ने जिस रफ्तार से पास बढ़ाया था, उसमें अलवरेस की जगह अर्जेंटीना के किसी भी खिलाड़ी के सिर्फ पैर अड़ा देने भर से भी गोल होने की गारंटी थी।

मेसी का दौर पेले और माराडोना से ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। पेले को अपनी टीम में गरिंचा और टोस्टाओ जैसे दिग्गजों का साथ मिला था। माराडोना को वातुस्तिता जैसे साथी मिले। मेसी को अकेले लड़ना पड़ा।

फिर मेसी जिस दौर में फुटबॉल खेल रहे हैं, वह फुटबॉल के वैश्वीकरण का दौर है, जब एशिया और अफ्रीका की टीमें भी फुटबॉल की पावर हाउसेज हैं। पेले और माराडोना को मैदान में विपक्ष से जितनी चुनौतियां मिलीं, मेसी को उनसे ज्यादा मिलीं।

मेसी की यह शिल्पकारी इसलिए भी यादगार है, क्योंकि कलात्मक फुटबॉल का दौर खत्म हो चुका है। यह यूरोपीय शैली के लंबे पास और ताकतवर शॉट्स का दौर है। चूंकि एशिया से लेकर अफ्रीका तक के खिलाड़ी यूरोपीय क्लबों में खेलते हैं, इसलिए सभी का खेल कमोबेश एक-सा है। ताकत के इस फुटबॉल में ब्राजील, उरुग्वे और पुर्तगाल जैसी टीमें बेचारा बन गई हैं। फुटबॉल से कलात्मकता की यह विदाई क्रिकेट में भारत जैसे देशों से स्पिन गेंदबाजी के दौर की विदाई की तरह है।

अलबत्ता जब विश्व कप से मेसी की विदाई हो रही है, तब फुटबॉल की दुनिया को इसका संतोष जरूर है कि अगले कुछ वर्षों तक उसे फ्रांस के विस्फोटक स्ट्राइकर किलियान एमबापे का जादू देखने को मिलेगा, जिन्होंने दो ही विश्व कप में बारह गोल ठोककर जता दिया है कि विश्व कप में सर्वाधिक गोल करने वाले जर्मनी के मिरोस्लाव क्लोज के सोलह गोलों का रिकॉर्ड वह अगले ही विश्व कप में तोड़ दे सकते हैं।

(यह लेख जाने माने कवि और अमर उजाला के वरिष्ठ सहयोगी संपादक कल्लोल चक्रवर्ती की फेसबुक वॉल से लिया गया है )