राजनीतिक शास्त्रार्थ क्यों बन गई राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा?


राहुल गांधी की यात्रा जन समर्थन और भीड़ के नजरिये से देखने पर पूरी तरह से सफल और सार्थक लगती है लेकिन इसकी सार्थकता कांग्रेस की मजबूती के साथ ही प्रमाणित हो सकेगी।


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सरयूसुत मिश्रा।

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा मध्यप्रदेश से आगे निकल गई है। यह यात्रा पहली बार ऐसे राज्य में पहुंची हैं जहां कांग्रेस सत्ता में है। मध्यप्रदेश से यात्रा को विदा करते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को उनके राज्य में यात्रा को मध्यप्रदेश से अधिक सफल और सार्थक बनाने के लिए मजाक में ही चुनौती देकर मध्यप्रदेश में इस यात्रा को मिले शानदार रिस्पांस को रेखांकित किया है।

मध्यप्रदेश में यह यात्रा 12 दिन चली। बुरहानपुर से शुरू होकर यात्रा ने आगर मालवा की सीमा से राजस्थान में प्रवेश किया। मध्यप्रदेश में यात्रा से जिस तरह के राजनीतिक संदेश आए हैं, उससे ऐसा लगता है कि कन्याकुमारी से जिन उद्देश्यों से यात्रा चली थी, मध्यप्रदेश में उन उद्देश्यों से यात्रा ने अपनी दिशा बदल दी है।

पूरी यात्रा मध्यप्रदेश में 2023 के चुनाव के लिए भाजपा से मुकाबले का संदेश देने के लिए कमल की पिच पर ही चली गई। भारत जोड़ो यात्रा के समन्वयक भले ही दिग्विजय सिंह हों लेकिन मध्यप्रदेश में सारा प्रबंधन और मैसेजिंग कमलनाथ के अनुरूप हुई है। कमलनाथ हिंदुत्व की राजनीति में बीजेपी के मुकाबले में बराबरी से हिस्सेदार दिखने की लगातार कोशिश करते रहे हैं।

साल 2018 के चुनाव में भी उन्होंने इसी रणनीति पर काम किया था। मध्यप्रदेश में राहुल गांधी की पूरी यात्रा उसी रणनीति को समर्पित हो गई। शायद राहुल गांधी ने यात्रा शुरू करते हुए नहीं सोचा होगा कि आगे चलकर यह पूरी यात्रा भाजपा-कांग्रेस के धर्म और हिंदुत्व की परंपरागत राजनीतिक टसल पर ही केंद्रित हो जाएगी।

कमलनाथ अब राहुल गांधी के हवाले से हिंदू धर्म के प्रति शास्त्रार्थ के लिए बीजेपी को चुनौती दे रहे हैं। राहुल गांधी ने पूरी यात्रा में ओंकालेश्वर, महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में पूजा पाठ के साथ अपनी हिंदूवादी छवि को ही स्थापित करने की कोशिश की है। जैन मुनि से आशीर्वाद भी इसी रणनीति का हिस्सा दिखाई पड़ता है। पूरी यात्रा के दौरान सभाओं और भाषणों को अगर देखा जाए तो उसमें भी धर्म-कर्म और तपस्या को ही राहुल गांधी ने महत्व दिया है।

महाकाल की नगरी उज्जैन की सभा में तो उन्होंने तपस्वी शब्द की जो व्याख्या की उसे सुनकर गीता और धर्म की जानकारी रखने वाले भी भौंचक रह गए। राहुल गांधी की यात्रा से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाकाललोक का लोकार्पण किया था। उस समय नरेंद्र मोदी ने जो भाषण दिया था, वह पूरी तौर से भगवान शिव की महिमा, उज्जैन के धार्मिक महत्व और सनातन धर्म पर ही केन्द्रित था।

पीएम मोदी द्वारा अपने भाषण में कोई भी राजनीतिक बात नहीं करने पर लोगों की प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक रही थी। राहुल गांधी ने जब महाकाल की नगरी में दिए अपने सम्बोधन में धर्म-कर्म और धार्मिक उद्धरणों का उपयोग किया, तब लोगों ने मजबूर होकर मोदी और उनके भाषण को तोलने की कोशिश की। दोनों के भाषणों में शब्दों की गहराई और ऊंचाई में जमीन आसमान का अंतर दिखाई पड़ा।

भारत जोड़ो यात्रा मध्यप्रदेश में कमलनाथ की अगले चुनाव के लिए प्रचार यात्रा के रूप में ही ज्यादा सफल मानी जा सकती है। कमलनाथ के समर्थकों में उत्साह साफ-साफ देखा गया। उज्जैन में तो यात्रा के पहुंचने पर राहुल गांधी की उपस्थिति में जय-जय कमलनाथ के नारे के वीडियो ने पूरी यात्रा में कांग्रेस की गुटीय राजनीति को उजागर कर दिया। राहुल गांधी की यात्रा कांग्रेस विधायकों की बगावत और ज्योतिरादित्य सिधिया पर छींटाकशी से अलग नहीं रह सकी।

राहुल गांधी पूरी यात्रा में हर दिन की डायरी लिख रहे हैं। इस डायरी में जनता के साथ बातचीत और उसके साथ कांग्रेस संगठन और चुनाव के नजरिए से नेताओं के आकलन को नोट किया जा रहा है। मध्यप्रदेश में कमलनाथ के अलावा जिन दो नेताओं ने राहुल गांधी के मन मस्तिष्क में अपनी छवि मजबूत की है, उनमें जीतू पटवारी और दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह शामिल हैं।

जीतू पटवारी ने राहुल गांधी की यात्रा के स्वागत के लिए अपने विधानसभा क्षेत्र में जिस तरह से तैयारियां और जनसमर्थन जुटाया, उसने राहुल गांधी का ध्यान आकर्षित किया है। बुरहानपुर में निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा को यात्रा की सफलता का श्रेय जाता है।

अरुण यादव, सचिन यादव यात्रा में शामिल तो थे लेकिन यह दोनों नेता अपना प्रभाव स्थापित करने में सफल होते नहीं दिखाई पड़े। इसी प्रकार पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह भी राहुल गांधी की पूरी यात्रा में नदारद दिखे। सुरेश पचौरी यात्रा में दिखाई तो दे रहे थे लेकिन उनकी भूमिका भी कमलनाथ के समर्थक के रूप में देखी जा रही थी। नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर गोविंद सिंह अपना कोई खास प्रभाव यात्रा के दौरान नहीं दिखा सके।

जीतू पटवारी और जयवर्धन सिंह को राहुल गांधी की मध्यप्रदेश यात्रा का सर्वाधिक लाभ मिलता दिखाई पड़ रहा है। बहुचर्चित मंदसौर गोली कांड के सन्दर्भ में जब राहुल गांधी मध्यप्रदेश आए थे तब सरकार से लुका छुपी करते हुए जीतू पटवारी ही राहुल गांधी को अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर ले गए थे। राहुल गांधी उनके प्रति पहले से सॉफ्ट थे लेकिन भारत जोड़ो यात्रा में जीतू पटवारी ने अपनी विधानसभा क्षेत्र में भारी जनसमर्थन के साथ ही व्यवस्थाओं को उत्कृष्टता के साथ अंजाम देकर नंबर बढ़ा लिए हैं।

दिग्विजय सिंह के बेटे के रूप में जयवर्धन सिंह राहुल गांधी से निश्चित रूप से परिचित और संपर्क में होंगे लेकिन सीधे तौर पर राहुल गांधी से कनेक्ट होने का उन्हें इस यात्रा में एक अच्छा मौका मिला। उन्होंने इसका पूरा लाभ भी उठाया। यात्रा में साथ चलने के साथ ही अपने प्रभार वाले जिला आगर मालवा में यात्रा के भरपूर स्वागत सत्कार में उन्होंने सफलता हासिल की।

जयवर्धन सिंह का विधानसभा क्षेत्र राघौगढ़ और उनके परिवार का परंपरागत संसदीय क्षेत्र राजगढ़ का बड़ा हिस्सा यात्रा में सीधे तौर पर नहीं आ रहा था लेकिन राहुल गांधी से सीधे बातचीत करके जयवर्धन सिंह ने आगर मालवा जिले में अपने विधानसभा और संसदीय क्षेत्र का एक कार्यक्रम अलग से आयोजित कराया था। इस कार्यक्रम में राहुल गांधी का राघौगढ़ की संस्कृति के अनुरूप स्वागत किया गया था। राघौगढ़ से बुलाए गए ढपलों की थाप पर मध्यप्रदेश की भावी राजनीति राहुल गांधी के अवचेतन मन में डाली गई।

मध्यप्रदेश में भारत जोड़ो यात्रा में विवादास्पद परिस्थितियां भी निर्मित हुईं। पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे से कांग्रेस पार्टी स्वयं चक्रव्यूह में फंस गई। कमलनाथ अब सफाई दे रहे हैं कि लाइव कार्यक्रम में पार्टी की ओर से ट्वीट कर दिया गया था। यात्रा में सोशल एक्टिविस्टों की भूमिका साफ-साफ देखी गई है। जिस तरह के चेहरे यात्रा में देखे गए उसके कारण बीजेपी ने उन चेहरों की भारत विरोधी भूमिकाओं को उजागर करने में कोई कमी नहीं रखी।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि राहुल गांधी क्या कमल की पिच पर ही कांग्रेस को राजनीतिक मुकाबले में ले जाना चाहते हैं? जब राजनीतिक हिंदुत्व ही चुनना है तो फिर असली हिंदुत्व के पैरोकारों को ही जनता चुनना चाहेगी। कांग्रेस अपना एजेंडा क्यों नहीं सेट कर पा रही है?

यह यात्रा राहुल गांधी की निजी छवि को बदलने का काम कर रही है लेकिन कांग्रेस की छवि वही की वही बनी हुई है। भाजपा और आरएसएस के साथ कांग्रेस की वैचारिक लड़ाई आजादी के समय से है। वही लड़ाई भारत जोड़ो यात्रा में भी उसी स्वरूप में देखी जा रही है तो फिर देश में जो भी राजनीतिक हालात हैं उनसे मुकाबला करने के लिए कांग्रेस कैसे तैयार हो सकेगी?

कमलनाथ कह रहे हैं कि मध्यप्रदेश में 12 दिन की यात्रा के दौरान मेहनत कर-कर के मर गए। इसका मतलब है कि जो उम्रदराज नेता पैदल चलने में सक्षम नहीं हैं वह पार्टी चलाने में सक्षम कैसे माने जा सकते हैं? राहुल गांधी की यात्रा जन समर्थन और भीड़ के नजरिये से देखने पर पूरी तरह से सफल और सार्थक लगती है लेकिन इसकी सार्थकता कांग्रेस की मजबूती के साथ ही प्रमाणित हो सकेगी।

(आलेख लेखक के सोशल मीडिया से साभार)