पुष्यमित्र भार्गव होंगे इंदौर में भाजपा के महापौर उम्मीदवार, जानिये क्या-क्या हुआ संघ और भाजपा की बैठकों में


– इंदौर महापौर के उम्मीदवार के लिए संघ और भाजपा में बड़े मतभेद सामने आए।
– डॉ. निशांत खरे के विकल्प के रुप में रखा गया भार्गव का नाम, मधु सक्सेना भी थे कतार में लेकिन उम्र से पिछड़े


संतोष पाटीदार संतोष पाटीदार
राजनीति Updated On :
पुष्यमित्र भार्गव


इंदौर। भाजपा के द्वारा इंदौर में अपने महापौर प्रत्याशी के रूप में  हाईकोर्ट में अतिरिक्त महाधिवक्ता (इंदौर खंडपीठ) पुष्यमित्र भार्गव का नाम तय हुआ है। बताया जा रहा है कि इसकी घोषणा कुछ ही समय में कर दी जाएगी। कुछ समय पहले तक भोपाल में भाजपा के समानांतर संघ कार्यालय में भी क्षेत्रीय प्रचारक के साथ महापौर प्रत्याशी चयन पर मंथन हो रहा था। यह बैठक शाम करीब साढ़े सात बजे तक चली।

इस बैठक में डॉ निशांत खरे को लेकर मीडिया में आ रही खबरों पर भी बात हुई। ये ख़बरें निशांत के ख़िलाफ़ थीं और इससे माहौल भी उनके खिलाफ़ ही बना। इस बैठक में  चर्चाओं में चल रहे दूसरे नाम पर भी बात हुई। यह नाम था वकील पुष्यमित्र भार्गव का, जिनके रिकार्ड को देखते हुए उनका नाम तय किया गया है। जानकारी की मानें तो इसकी जानकारी भाजपा कार्यालय को दे दी गई है। संघ की ओर से यह जानकारी भाजपा के महामंत्री हितानन्द शर्मा का फोन पर दी गई और दूसरी ओर से उन्होंने भाजपा नेताओं की बैठक की जानकारी साझा की।

जहां आईडीए के पूर्व अध्यक्ष मधु वर्मा पर आम राय बनी थी लेकिन साठ साल के हो चुके वर्मा की उम्र उनके चयन में आड़े आ गई। संघ ने भी बुजुर्ग नेताओं को तवज्जो देने से इंकार किया। इसके बाद हितानन्द शर्मा ने संघ से डॉ खरे के विकल्प में एक नाम मांगा। इस पर संघ की ओर से पुष्यमित्र का नाम दे दिया गया है। जिस पर दोनों की सहमति की ख़बरें आ रहीं हैं। ऐसे में पुष्यमित्र भार्गव का नाम लगभग तय है।

क्या-क्या हुआ?

इससे पहले भाजपा इंदौर में मेयर पद के प्रत्याशी के नाम में उलझ गई है और काफी प्रयासों के बावजूद भाजपा में किसी एक नाम पर आम सहमति नहीं बन पा रही थी।

डॉ. निशांत खरे

इस पद के लिए डॉक्टर निशांत खरे, डॉ. सचिन शर्मा और पुष्यमित्र भार्गव के नाम की चर्चा जोरों पर थी लेकिन इनके नाम पर सहमति नहीं बन पाने के कारण पेंच फंसा हुआ था।

पार्टी सूत्रों की मानें तो सोमवार रात को हुई पार्टी की बैठक में एक बड़े नेता ने डॉ. निशांत खरे के नाम पर आपत्ति उठाई और कहा उनकी जगह किसी पार्टी कार्यकर्ता को टिकट दिया जाना उचित होगा।

इस बड़े नेता के विरोध के कारण ही  इस बैठक में अंतिम रूप से यह तय हुआ कि अब डॉ. निशांत खरे की जगह किसी और के नाम पर विचार किया जाएगा।

संघ अडिग…

इंदौर के महापौर पद पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक व भारतीय जनता पार्टी (स्थानीय) के बीच खुले टकराव की स्थिति बन गई थी। खबरों के मुताबिक भाजपा संघ के अनुशंसित नाम के अलावा अपनी ओर से नए-पुराने नेताओं को बतौर प्रत्याशी के लिए दावेदार बनाती जा रही थी।

संघ ने डॉ. निशांत खरे का एकल नाम रखा लेकिन साथ ही पुष्यमित्र भार्गव को भी जोड़ा गया। डॉ. खरे के नाम पर संघ पदाधिकारी तमाम भाजपाई विरोध के बाद भी अडिग थे। यहां कहा गया कि पुष्यमित्र भी मंजूर हैं, लेकिन संघ में उनकी सीनियरिटी उतनी नहीं है जितनी डॉ. खरे की थी।

वैसे संघ के बाहर इस तर्क का कोई अर्थ नहीं था। डॉ. निशांत खरे सह विभाग प्रचारक रहे जब कि पुष्यमित्र एबीवीपी में रहे। कहा गया कि डॉ. खरे के व्यक्तित्व व उनकी क्षमताओं का कोई तोड़ नहीं है, लेकिन उनके विरोध की स्थिति में पुष्यमित्र उनके विकल्प भी बताए गए।

अब की बात करें तो पुष्यमित्र भार्गव का नाम केवल विकल्प नहीं है बल्कि एक मजबूत विकल्प है क्योंकि वे कानून के अच्छे जानकार हैं,  सरकारी काम-काज व नियम-कायदों की गहरी समझ रखते हैं। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी भी उनकी प्रशंसा करते हैं।

इस आधार पर कुछ वरिष्ठ स्वयंसेवकों ने भाजपाइयों की भीतरखाने चल रही योजना को भांपकर ही केंद्रीय अधिकारियों को पुष्यमित्र के नाम का ठोस विकल्प सुझाया था।

इसके अलावा स्थानीय ताई व भाई खेमा समान रूप से संघ प्रस्तुत प्रमुख नाम पर हरगिज़ राजी नहीं है। इस लिहाज से पुष्यमित्र को लेकर कोई विरोध नहीं है।

भाजपाई विरोध का विकल्प है पुष्यमित्र !

जिन तर्को से संघ के दावेदार को भाजपाई कमजोर साबित कर रहे हैं उसका कड़क जवाब पुष्यमित्र हैं। शहर में सामाजिक, राजनीतिक, व्यवसायिक व मीडिया में सजीव नेटवर्क है। सभी वर्गों में उनकी स्वीकार्यता है।

शासकीय व प्रशासनिक दीर्घ अनुभव के मामलों में वे भाजपा के बड़े नेताओं पर भी भारी हैं। ब्यूरोक्रेसी से कैसे काम लेना व कैसे उसकी नकेल कसना, इस विधा के भी वे जानकार हैं।

लेकिन कहा जाता है कि बहुत पहले करीब आधा दर्जन संघ के प्रमुख नेताओं ने डॉ. खरे के नाम पर ठप्पा लगाया था इसलिए कोई भी संघ नेता चाहते हुए भी विकल्प पर बात करने को तैयार नहीं। बावजूद इसके पुष्यमित्र के नाम को संघ के कई नेताओं ने आगे बढ़ाया।

वैसे डॉ. खरे चुनाव में जाने को लेकर उहापोह में थे लेकिन उन्होंने आधे-अधूरे मन से इंकार किया इसलिए उनकी असहमति को गंभीरता से नहीं लिया गया जबकि पुष्यमित्र पूर्ण रूपेण सहमत थे। इस तरह एक की बजाय दो-तीन नाम भाजपा की सूची में बने रहे। कुछ और भी जुड़ते चले गए।

शह और मात का खेल –

इस उठापटक के बीच भाजपा में विरोध की खिचड़ी भी पक कर तैयार होती रही। एक दिन की चुप्पी के बाद भाजपा के स्थानीय भारी भरकम दावेदारों ने पर्दे के पीछे से संघ के सुझाए नामों को निशाने पर लेते हुए कोल्ड वार छेड़ दिया।

अखबारों व सोशल मीडिया में लिखी व लिखवाई गई मिलती-जुलती स्क्रिप्ट दौड़ा दी गई। फिक्स प्रचार तंत्रियों के नाम से संघ को खरी-खरी सुनाई गई। संघ से आये दावेदारों को पैराशूट उम्मीदवार कहकर टारगेट किया गया।

कार्यकर्ताओं के हक मारने वाले नेता सोशल मीडिया के माध्यम से अपने हक की आवाज उठाने लगे। इस खेल में खुद को संघ निष्ठ बताने वाले, अलग-अलग खेमों में बंटे भाजपा नेता एक जाजम पर नजर आ रहे हैं।

वजह सबका एकमेव लक्ष्य, शेर(संघ) को राजनीति के जंगल मे घुसने से रोकना है। आगे विधानसभा चुनाव है। संघ को अभी से नहीं रोका गया तो काले केश व काले चश्मे लगाए बुढ़ापा छुपाने की कोशिश करते बेहिसाब सत्ता सुख भोग रहे कांग्रेस से भाजपा में आये वयोवृद्ध व 55 पार वाले भाजपाइयों के साथ विवादित युवा नेताओं के राजनैतिक पटिये उलाल हो जायेंगे।

जो भी हो बीते तीन दिनों से लेकर आज तक शहर की कान्ह व सरस्वती नदी में शह-मात के खेल का काफी पानी बह गया है। छ्द्म युद्ध के बीच कल डॉ. खरे के नाम की घोषणा सोशल मीडिया ने कर दी थी।

संघ के ही कुछ उत्साहित भाइयों ने भाजपाइयो की तरह डॉ. खरे की जीवनी व उपलब्धियों की जय-जयकार कर भाजपाई दावेदारों को जवाब देने की असफल कोशिशें कीं जबकि भाजपा के सयाने भोपाली नेताओं ने किसी तरह की घोषणा नहीं की। मंगलवार दोपहर तक भी सन्नाटा पसरा था।

अवरोध की हर कोशिश –

कहा जा रहा है संघ की राह में अवरोध खड़े करने की मुहिम में अदृश्य स्वरूप में नीति निर्धारक नेता भी मौन समर्थन दे रहे हैं। भोपाल में बैठकें, फिर दिल्ली में, फिर वापस भोपाल में आधी रात तक की बैठक कर सुबह इंदौर के नेताओं को भोपाल बुलाना। यह सब या तो भाजपाइयों को गफलत में रखकर संघ के निर्देश का पालन करना या संघ को बैकफुट पर जाने को मजबूर करने जैसा दिखता है जो आसान नहीं है।

इससे पहले विधायक रमेश मेंदोला ने यकायक अपने को आगे कर दिल्ली-भोपाल तक हल्ला मचाया। यह ऐसे ही नहीं था वरन विरोध का संदेश था। इसका मीडिया में दो-तीन दिन हल्ला मचाया गया।

इसके बाद भाजपा ने विधायकों को एक व्यक्ति-एक पद की सीमा याद दिलाई। शायद संघ ने आंखे तरेरी हों। तीन दिन इस तरह निकाल दिये गये।

कयास लगाए जा रहे हैं कि यह सब संघ की पसंद के प्रत्याशी की घोषणा से बचने के लिए समय खींचने की टैक्टिक्स का हिस्सा है। ताकि नामांकन की तारीख नजदीक आ जाये और ताबड़तोड़ भाजपा द्वारा अपने किसी नेता के नाम की घोषणा कर दी जाये।

यह इससे भी स्पष्ट हो रहा है कि कल जहां भाजपा से मधु वर्मा फिर दौड़ में प्रकट हुए और आज उनके प्रतिस्पर्धी जीतू जिराती का नाम भी दौड़ में वापस आ गया।

संघ व भाजपा के इस पूरे एपिसोड से यही समझ आता है कि सब तरह से दबे-छुपे हथकंडे अपना कर किसी तरह संघ को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश हो रही है ताकि संघ आलोचनाओं व बदनामी के घेरे में स्वतः आ जाए।

इससे उसके दावेदारों का मनोबल भी कमजोर पड़ जायेगा। मीडिया में उन्हें योजनाबध्द तरीके से व्यक्तिगत आलोचनाओं का शिकार बनाया जा रहा है ताकि इस तरह की निकृष्ट चर्चाओं से प्रताड़ित हो वे खुद ही दावेदारी से पलायन कर जाएं।

समाज व सरकार में आमूलचूल बदलाव का प्रयोग –

लोकसभा व विधानसभा चुनावों व फिर उपचुनाव के बाद अब स्थानीय निकायों के चुनाव में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सीधी भागीदारी की नीति अपनाई हुई है। संघ समाज और एक सरकार की भ्रष्ट, चारित्रिक पतन व सड़ी-गली शासन-प्रशासन की गैर जिम्मेदारी वाली व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव चाहता है।

इससे पहले संघ ने राजनीति से परहेज की नीति अपनाई थी। साथ मे संघ से भाजपा में भेजे गए अधिकांश नेता भी संघ के पैमाने पर खरे नहीं उतरे इसलिए संघ ने रणनीति बदलते हुए पंचायत से लोकसभा-राज्यसभा तक प्रत्याशी चयन व चुनावी जीत में सीधे प्रभुत्व की नीति पर काम करना शुरू किया है।

हर पहलू पर विचार के बाद संघ द्वारा खांटी सुसंस्कारित शिक्षित-दीक्षित, हिंदुत्व विचारों में रचे-बसे स्वयंसेवकों को प्रमुख शहरी निकायों में नेतृत्व सौंपने के लिए भाजपा को नाम पहुंचाए गए।

इंदौर के महापौर पद के प्रत्याशी के लिए वरिष्ठ स्वयंसेवक व पूर्व विभाग सह संचालक युवा चिकित्सक डॉ. निशांत खरे का नाम प्रान्त से केंद्रीय संघ अधिकारियों को प्रस्तुत किया गया था।

मासला चूंकि जमीन के सौदागरों के साथ अर्थ-प्रधान नगरी व राष्ट्रीय भाजपा नेताओं की अड़ियल खेमेबाजी के लिए ब्रह्माण्ड में विख्यात इंदौर का है इसलिए भाजपा नेताओं को संघ की मनमर्जी स्वीकार नहीं है।

शुरुआत में संघ के डंडे के प्रभाव से नेता चुप रहे पर अंदरूनी मंत्रणा होने के बाद दावेदारी के माध्यम से विरोध में आ गये। पार्टी की राष्ट्रीय खेमेबाजी से जुड़े दावेदारों के कारण संघ की बिसात पर रायता ढुलना ही था।

मुख्यमंत्री व संगठन दोनों के लिए खंभ ठोंक खड़े दावेदार दिखावटी परेशानी का कारण बनते नजर आए। इधर, संघ ने डॉ. खरे के नाम का एक लाइन का निर्देश पार्टी हाईकमान को भेजकर हमेशा की तरह मौन साध लिया।

भाजपा नेताओं को संघ का यह रुख नहीं पचा। भाजपा के दावेदारों ने भोपाल-दिल्ली एक कर दिये। साथ ही सम्पर्क वाले संघ के बड़े नेताओं के ब्रेनवाश की कोशिशें भी जारी हैं। नतीजे में अनमने मन से भाजपा को हर दिन प्रत्याशी चयन की गाइडलाइन बदलनी पड़ी ताकि डॉ. खरे के नाम को नक्खी किया जा सके।



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