नई और पुरानी पेंशन योजनाः कर्मचारियों के दबाव में हैं केंद्र और राज्य सरकारें, कांग्रेस ने पहले चल दिया है दांव


नई पेशन योजना लाने की जरुरत इसलिए पड़ी क्योंकि पुरानी पेंंशन योजना का बोझ करदाताओं पर पड़ रहा था। तीन दशकों में सौ गुना से ज्यादा बढ़ा है ये बोझ।


देश गांव
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भोपाल।  कांग्रेस इस समय भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रही है। भाजपा जहां अपने पुराने वादों पर बोलने में कतरा रही है वहीं कांग्रेस उन मुद्दों के साथ जनता के बीच जा रही है जिन्हें लेकर भाजपा की सबसे ज्यादा आलोचना हो रही है। ये मुद्दे हैं महंगाई और बेरोजगारी। इसके अलावा तीसरा मुद्दा जो सबसे ज्यादा कर्मचारियों को लुभा रहा है वह है पुरानी पेंशन योजना (OPS)।

कांग्रेसी इसी पुरानी पेंशन योजना को दोबारा लागू करने का सपना दिखा रहे हैं। हालांकि पार्टी ने अपने राज में राजस्थान और छत्तीसगढ़ में यह योजना लागू कर दी है। गुरुवार को फिर कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से इस योजना के बारे मे बात की गई है।

पुरानी पेंशन योजना पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी के राज मे ही खत्म की गई। इस योजना को दिसंबर 2003 में तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने खत्म कर दिया था और 1अप्रैल 2004 राष्ट्रीय पेंशन स्कीम यानी एनपीएस लागू कर दी थी। हालांकि इस पर विचार साल 1996 से ही किया जाने लगा था।

इस तारीख़ के बाद सरकारी नौकरी शुरु करने वाले लोगों को एनपीएस का पात्र माना गया। हालांकि इसके बाद से एनपीएस को लेकर कर्मचारियों ने खूब विरोध किया जो अब 18 साल बाद तक भी जारी है। कर्मचारियों ने इस पेंशन स्कीम के तहत उन्हें कम लाभ मिलने की बात कही लेकिन सरकारों ने इसे नहीं माना।

इसके तहत राज्य और केंद्र के कर्मचारियों ने कई बार विरोध प्रदर्शन किया। हर बार कर्मचारी संगठनों के मांगपत्र में यह मुद्दा जरूर शामिल होता है। ऐसे में कांग्रेस ने कर्मचारियों की इस मांग को हाथों हाथ लिया और अपने शासन के राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में इसे लागू कर दिया।

हालांकि एनपीएस को लाने के कई खास मकसद रहे। इनमें एक अहम मकसद था कि पेंशन पर हो रहे खर्च में कटौती करना और कर्मचारियों को पेंशन के लिए एक अलग से फंड बनाना ताकि आने वाले समय में सरकारों और नागरिकों पर पुरानी पेंशन का बोझ न पड़े यह इसलिए सोचा गया क्योंकि भारत सरकार के पास पेंशन के लिए कोई अलग से फंड नहीं था। यह सरकारी खजाने से ही दी जाती थी यानी आज के करदाता पुरानें पेंशनधारियों के लिए पेंशन का इंतज़ाम करते हैं। और अगर पुरानी पेंशन योजना लागू होती है तो ऐसा ही आगे भी होने वाला है।

पुरानी पेंशन योजना का बोझ भी कठिन है क्योंकि पेंशन फंड के लिए राशि जुटाना मुश्किल हो रहा था। इसे आंकड़ों से समझने की कोशिश करें तो पेंशनरों की राशि में समय-समय पर बढ़ोत्तरी होती है ऐसे में यह राशि जुटाने के लिए भी सरकारों को टैक्स या रैवेन्यु के दूसरे माध्यमों में बढ़ोत्तरी करनी पड़ती है।

बीतें तीन दशकों में केंद्र और राज्यों के लिए पेंशन देनदारियां कई गुना बढ़ चुकी हैं। 1990-91 में, केंद्र का पेंशन बिल 3,272 करोड़ रुपये था, और सभी राज्यों को मिलाकर कुल देनदारी 3,131 करोड़ रुपये था। इसके बाद 2020-21 तक केंद्र का बोझ 58 गुना बढ़ गया और 1,90,886 करोड़ रुपये हो गया था वहीं राज्यों के मामले में यह सभी का मिलाकर 125 गुना बढ़ा और 3,86,001 करोड़ रुपये हो गया था। फिलहाल पुराने पेंशनरों को न्यूनतम 10000 हजार रुपये और अधिकतम 62500 रुपये मासिक पेंशन प्राप्त होती है।

NPS को जानिये…

एनपीएस के तहत कर्मचारियों को पुरानी पेंशन स्कीम के मुकाबले बेहद कम लाभ मिलता है। इसके तहत कर्मचारी अपनी नौकरी के दौरान अपने वेतन से जमा हुए पैसों को निवेश करने की अनुमति दे सकते हैं। इसके अलावा रिटायरमेंट के बाद  बाद पेंशन राशि का एक हिस्सा एकमुश्त निकालने की छूट है और बाकी रकम पर एक तरह के बीमा उत्पाद के रुप में  एन्युटी (Annuity) प्लान खरीद सकते हैं। इससे कर्मचारी को थोड़ा-थोड़ा पैसा नियमित रुप से उसकी मृत्यु होने तक मिलता है और बाद में बची हुई राशि नामित व्यक्ति को दी जाती है।

हालांकि कर्मचारियों का विरोध इसी जगह है। उनके मुताबिक पीएफ के पैसे को निवेश करने पार अच्छा रिटर्न मिल सकता है लेकिन क्या इसकी कोई गारंटी है।

पुरानी और नई पेंशन स्कीम को लेकर खुद सरकारें भी कर्मचारियों के लिए चिंतित हैं। कर्मचारियों के हिसाब से यह राज्य और केंद्र का मामला बन चुका है। पिछले दिनों खबर आई थी कि खुद केंद्र सरकार 2024 के चुनावों से पहले केंद्र के कर्मचारियों के लिए यह निर्णय लागू कर सकती है। सीधे तौर पर इसे समझें तो केंद्र सरकार कर्मचारियों की नाराज़गी मोल लेना नहीं चाहती। वहीं अब बहुत से राज्यों में भी भाजपा की सरकार है ऐसे में उनपर भी पुरानी पेंशन योजना को दोबारा लागू करने का दबाव बन रहा है लेकिन कांग्रेस शाषित राज्य इस काम में कहीं ज्यादा आगे हैं।

पुरानी पेंशन योजना को लेकर कर्मचारियों की मांग समझने के लिए नई और पुरानी में पेंशन योजना में अंतर को भी समझना चाहिए।

OPS और NPS में 10 बड़े अंतर

पुरानी पेंशन योजना (OPS) नई पेंशन योजना (NPS)
ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) में पेंशन के लिए वेतन से कोई कटौती नहीं होती. NPS में कर्मचारी के वेतन से 10% (बेसिक+DA) की कटौती होती है.
पुरानी पेंशन योजना में GPF (General Provident Fund) की सुविधा है. NPS में जनरल प्रोविडेंट फंड (GPF) की सुविधा को नहीं जोड़ा गया है.
पुरानी पेंशन (OPS) एक सुरक्षित पेंशन योजना है. इसका भुगतान सरकार की ट्रेजरी के जरिए किया जाता है. नई पेंशन योजना (NPS) शेयर बाजार आधारित है, बाजार की चाल के आधार पर ही भुगतान होता है.
पुरानी पेंशन OPS में रिटायरमेंट के समय अंतिम बेसिक सैलरी के 50 फीसदी तक निश्चित पेंशन मिलती है. NPS में रिटायरमेंट के समय निश्चित पेंशन की कोई गारंटी नहीं है.
पुरानी पेंशन योजना में 6 महीने के बाद मिलने वाला महंगाई भत्ता (DA) लागू होता है. NPS में 6 महीने के बाद मिलने वाला महंगाई भत्ता लागू नहीं होता है.
OPS में रिटायरमेंट के बाद 20 लाख रुपए तक ग्रेच्युटी मिलती है. NPS में रिटायरमेंट के समय ग्रेच्युटी का अस्थाई प्रावधान है.
OPS में सर्विस के दौरान मौत होने पर फैमिली पेंशन का प्रावधान है. NPS में सर्विस के दौरान मौत होने पर फैमिली पेंशन मिलती है, लेकिन योजना में जमा पैसे सरकार जब्त कर लेती है.
OPS में रिटायरमेंट पर GPF के ब्याज पर किसी प्रकार का इनकम टैक्स नहीं लगता है. NPS में रिटायरमेंट पर शेयर बाजार के आधार पर जो पैसा मिलेगा, उस पर टैक्स देना पड़ेगा.
OPS में रिटायरमेंट के समय पेंशन प्राप्ति के लिए GPF से कोई निवेश नहीं करना पड़ता है. NPS में रिटायरमेंट पर पेंशन प्राप्ति के लिए NPS फंड से 40 फीसदी पैसा इन्वेस्ट करना होता है.
OPS में 40 फीसदी पेंशन कम्यूटेशन का प्रावधान है. NPS में यह प्रावधान नहीं है. मेडिकल फैसिलिटी (FMA) है, लेकिन NPS में स्पष्ट प्रावधान नहीं है.

 

 



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