बारिश के इंतज़ार में किसान, सोयाबीन पर मंडरा रहा ख़तरा


इंदौर के आसपास के गांवों में फसल की स्थिति लगातार बिगड़ रही है


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उनकी बात Published On :

इंदौर। प्रदेश में बारिश की स्थिति अब बद से बदतर होने को है। जिसके चलते अब कुछ क्षेत्रों में सूखे के कयास भी लगाए जा रहे हैं। मालवा-निमाड़ में कई स्थानों पर दोबारा बोवनी की जरुरत आन पड़ी है। ऐसे में आने वाले एक करीब एक हफ्ते के बीच अच्छी बारिश नहीं हुई तो ज्यादातर इलाकों में दोबारा बोवनी करनी पड़ेगी।

किसानों के मुताबिक अब तक मौसम विभाग के तमाम अनुमानों पर भरोसा करते हुए वे कृषि कार्य करते रहे हैं लेकिन ये सभी अनुमान पूरी तरह गलत साबित हुए हैं।

मीडिया की खबरों के मुताबिक खंडवा जिले में अस्सी फीसदी किसान दोबारो बावनी कर तुके हैं। इसके अलावा आसपास के क्षेत्रों का भी यही हाल है। यहां या तो दोबारा बोवनी हो चुकी है या होने की तैयारी है। किसानों के मुताबिक बोवनी के बाद सोयाबीन की जो फसल खेतों में खड़ी भी है उसकी गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। ऐसे में नुकसान होना तय है।

दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार इस बार पिछले साल के तुलना में इंदौर में स्थिति अलग है। पिछले साल मानसून आने के बाद अगस्त के 20 दिनों में बारिश नहीं हुई थी, लेकिन इस साल अभी तक सिर्फ 4.5 इंच ही बारिश हुई है, जबकि पिछले साल 7.5 इंच बारिश हो चुकी थी।

खबर के मुताबिक 11 साल बाद जहां जुलाई में सबसे कम बारिश हुई है, वहीं गर्मी भी समय के लिहाज से बहुत ज्यादा (36.3 डिग्री) है। ऐसे में अभी मालवा-निमाड़ में अभी एक हफ्ते तक तो सोयाबीन, मक्का को नुकसान नहीं है, लेकिन इसके बाद भी बारिश नहीं हुई तो स्थिति खराब हो सकती है।

इंदौर के आसपास के गांवों में फसल की स्थिति लगातार बिगड़ रही है हालांकि कृषि विभाग ऐसा कहने से लगातार बच रहा है। विभाग के मुताबिक अगर अगले एक हफ्ते में पानी नहीं बरसा तो कुछ परेशानी हो सकती है।

इस साल 2.22 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन और 8500 हेक्टेयर क्षेत्र में मक्का की बोवनी हुई है। वैसे, मप्र में पिछले साल से बारिश कम है। अगर एक हफ्ते बाद बारिश आती है, तो फिर नुकसान की आशंका नहीं है।

भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान (आईआईएसआर) की निदेशक नीता खांडेकर ने बताया कि संस्थान सोयाबीन की नई वैरायटी रिलीज करता है।

इसके बाद सोयाबीन का ब्रीडर सीड (बीज) बनाते हैं। ये बीज सीड कॉर्पोरेशन व अन्य एजेंसियों को दिए जाते हैं। वहां ब्रीडर सीड से एक साल में फाउण्डेशन बनता है और फिर अगले साल में सर्टिफाइड सीड बनता है। फिर सीड कॉर्पोरेशन व अन्य एजेंसियां किसानों को बेच देती हैं।



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