13 साल में 3300 हादसे व 392 ने गंवाई जान, फिर भी नहीं हुआ समाधान


राऊ-खलघाट फोरलेन पर स्थित गणपति घाट पर 13 साल में 3300 हादसे हो चुके हैं। इसमें 392 से अधिक लोगों की जान गई है। हादसे रोकने का एकमात्र उपाय है भूल का स्थायी समाधान। घाट के दुर्घटना संभावित सात किमी हिस्से में सिक्स लेन बनाई जाए।


आशीष यादव आशीष यादव
धार Updated On :
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धार/धामनोद। मौत का पर्याय बन चुका गणपति घाट लगातार दुर्घटनाओं को अंजाम दे रहा है, लेकिन वहां पर बचाव की पहल शुरू नहीं हुई है। सैकड़ों जान लेने वाला गणेश घाट आज भी हादसे के दौर से गुजर रहा है, लेकिन जिम्मेदारों की अनदेखी और कार्य करने का लचीलापन का खामियाजा वाहन चालक भुगत रहे हैं। जबसे घाट का निर्माण हुआ है हादसों पर हादसे हो रहे हैं लेकिन कोई ठोस पहल मूर्त रूप नहीं ले पाई है।

गौरतलब है कि राऊ-खलघाट फोरलेन पर स्थित गणपति घाट में हादसों का दौर फिर शुरू हो गया है। पिछले एक माह में यहां सात हादसे हो चुके हैं। इनमें 11 वाहन क्षतिग्रस्त हुए हैं। गनीमत रही कि सातों हादसों में किसी को गंभीर चोट नहीं आई। चालक व परिचालकों ने चलते वाहन से कूदकर अपनी जान बचाई है।

यहां 13 साल में 3300 हादसे हो चुके हैं। इसमें 392 से अधिक लोगों की जान गई है। हादसे रोकने का एकमात्र उपाय है भूल का स्थायी समाधान। घाट के दुर्घटना संभावित सात किमी हिस्से में सिक्स लेन बनाई जाए।

इसकी एक साल पहले मंजूरी भी मिल चुकी है। जमीन वन विभाग से लेनी पड़ेगी, लेकिन निर्माण कार्य कब होगा, वह किसी को नहीं पता है। राहत की बात यह है कि वन विभाग धार व बड़वाह वन विभाग 24 हेक्टेयर जमीन देने के लिए प्रक्रिया शुरू कर चुका है।

राऊ-खलघाट फोरलेन का निर्माण 500 करोड़ रुपये की लागत से 2006 में शुरू हुआ था और यह 2008 में बनकर तैयार हुआ। फोरलेन निर्माण के दौरान गणपति घाट वाले हिस्से में तकनीकी खामी छूट गई।

विशेषज्ञों के अनुसार घाट की उतरने वाली लेन में ढलान जरूरत से ज्यादा है। इससे उतरते वाहनों के चालक जैसे ही ब्रेक लगाते हैं, ब्रेक लाइनर चिपक जाते हैं और वाहन बेकाबू हो जाते हैं।

ऐसे में तेज गति से दौड़ते भारी वाहन आगे चल रहे वाहनों से भिड़ जाते हैं। कभी-कभी डिवाइडर तोड़कर दूसरी लेन में चढ़ाई कर रहे वाहनों से भी टकरा जाते हैं या फिर रेलिंग तोड़कर खाई में जा गिरते हैं और हादसा बड़ा रूप धारण कर लेता है।

1600 लोग गंभीर रूप से घायल –

मानवीय भूल के चलते 13 साल में गणपति घाट में 3300 से अधिक हादसे हो चुके हैं। इनमें 392 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और 1800 गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इसी साल के फरवरी की बात करें, तो 25 दिन में सात हादसे हुए, जिनमें 11 वाहन क्षतिग्रस्त हो गए। गनीमत रही किसी को चोट नहीं लगी, परंतु हादसे के वक्त चालक व परिचालक चलते वाहन से सड़क पर कूद गए।

घाट पर अस्थायी सुधार भी नहीं रोक पाए हादसे – 

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भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) घाट सुधार के लिए अब तक कई तरह के प्रयास कर चुका है। एनएचएआई ने दुर्घटना संभावित क्षेत्र में स्पीड ब्रेकर बनवाए, हाईमास्ट लगाए, संकेतक बोर्ड और रेलिंग भी लगाई। हादसों के बैनर लगाने के साथ कानवाय (पुलिस की निगरानी में वाहनों का काफिला निकलना) के लिए पुलिस चौकी तक बनवाई। इन सभी कामों पर अब तक सरकार करोड़ों रुपये से ज्यादा खर्च कर चुकी है, किंतु ये सब उपाय भी हादसों पर अंकुश नहीं लगा पाए।

यह है समाधान –

विशेषज्ञों के अनुसार गणपति घाट पर स्थायी समाधान के तहत घाट के उक्त दुर्घटना संभावित सात किमी हिस्से में सिक्स लेन बनाना आवश्यक है। तभी वहां से बड़े और छोटे वाहनों को अलग-अलग लेन में निकाला जा सकेगा या फिर सात किलोमीटर का ब्रिज बनाया जाए, जिसमें ढलान ना हो। तभी हादसों पर अंकुश लग पाएगा।

प्रकिया शरू कर दी है –

धार जिला वनमंडलाधिकारी अक्षय राठौड़ ने बताया कि गणपति घाट में नए निर्माण के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा जमीन चिन्हित कर ली गई है। धार जिले की 20 हेक्टेयर और बड़वाह वन विभाग की करीब सात हेक्टेयर जमीन की आवश्यकता है। धार जिले द्वारा इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसके लिए जल्द ही मंजूरी मिल जाएगी। उसके बाद राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को प्रति हेक्टेयर निर्धारित राशि जमा करना होगी।

ढलान है मुख्य कारण –

गणेश घाट में ढलान ही हादसा होने का मुख्य कारण है। जिम्मेदारों ने इसे स्वीकार भी किया, लेकिन नए प्रस्तावित डीपीआर जिसमें नया घाट निर्माणाधीन है। उसके लिए ठोस पहल नहीं हो पाई। मौत के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। दोनों दलों के नेताओं ने यहां पर प्रयास भी किए, लेकिन निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया। गणेश घाट में आंदोलन भी हुए, लेकिन आज भी स्थिति यही कि वहां पर लगातार हादसे हो रहे हैं।



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