अल्पसंख्यक अधिकार दिवस के नाम पर राष्ट्रीय शर्म बन गयी है इंदौर की कौसर, हिना और यास्मीन की कहानी


‘देश से गद्दारी’ से जुड़े इस मामले को अख़बार लपकना चाहते थे और इस दौरान पत्रकारिता की तमाम ज़िम्मेदारियां भी भुला दी गईं। जिस मीडिया ने उन्हें देश के गद्दार के रूप में पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, उसने क्लीन चिट मिलने पर अपने लगाए गए आरोपों पर कोई सफाई नहीं दी।


अरूण सोलंकी अरूण सोलंकी
उनकी बात Updated On :
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इंदौर। मिलिट्री साइंस से एमए कर चुकी हिना और इसी कोर्स में गोल्ड मेडल हासिल कर चुकी यास्मीन इन दिनों आलू के खेतों में दिहाड़ी करने को मजबूर हैं। दसवीं तक पढ़ीं उनकी बड़ी बहन कौसर भी उनके साथ इन्हीं खेतों में डेढ़-दो सौ रुपये दिन पर काम कर रहीं हैं।

वे कहतीं हैं कि अगर काम नहीं करेंगी तो घर में खाने को भी नहीं मिलेगा क्योंकि अब घर में कुछ नहीं बचा है। इनके पिता भारतीय सेना में थे और फिलहाल मां को पेंशन मिलती है लेकिन इससे खर्च चलाना भी मुश्किल होता है।

करीब छह महीने पहले तक इन तीनों के पास ठीकठाक नौकरी थी लेकिन ईद के अगले ही दिन इनका नाम हर किसी की ज़ुबान पर था। इन हिना और यास्मीन पर भारत की जासूसी का इल्ज़ाम लगाया जा रहा था। एक फेसबुक चैट को आधार बनाकर इंदौर पुलिस ने इनसे पूछताछ की और कुछ दिनों तक नज़र बंद रखा।

इस दौरान तीनों बहनें अपनी मां के साथ घर के अंदर थीं लेकिन बाहर इनकी ज़िंदगियों का फैसला मीडिया के हाथों में था। मीडिया ने इनके बारे में कई बातें लिखीं। वे बातें जिनका कोई आधार ही नहीं था। इन्हें देशद्रोही कहा गया।

कहा गया कि ये महू छावनी की जानकारियां पाकिस्तान तक पहुंचा रहीं हैं और वहां आईएसआई के लोगों और पाकिस्तानी सेना के अफसरों से संपर्क में हैं। यास्मीन और हिना ने मिलिट्री साइंस की अपनी पढ़ाई में कोर्स वर्क के लिए महू छावनी की कुछ सामान्य तस्वीरें उतारीं थीं। कहा गया कि ये लड़कियां भारत से जुड़ी जानकारियां पाकिस्तान तक पहुंचा रहीं हैं।

‘देश से गद्दारी’ से जुड़े इस मामले को अख़बार लपकना चाहते थे और इस दौरान पत्रकारिता की तमाम ज़िम्मेदारियां भी भुला दी गईं।  बिना किसी ठोस आधार के अख़बारों ने इन लड़कियों के नाम तो प्रकाशित किये ही, साथ ही उनके बारे में सभी तरह की जानकारियां भी सार्वजनिक कर दीं।

हिना और यास्मीन की बड़ी बहन कौसर भारतीय जनता पार्टी की कार्यकर्ता रहीं हैं और इसके साथ ही वे एक शॉपिंग स्टोर में काम भी करतीं थीं। एक अख़बार ने कई आरोपों के साथ कौसर की तस्वीर भी प्रकाशित कर दी।

कौसर बताती हैं कि चार-पांच दिनों तक चली पुलिस की पूछताछ के बाद एक दिन जब उनका आठ साल का बेटा दूध लेने गया था तो उसे किसी ने यह अख़बार दिया था।

तीनों बहनें बताती हैं कि मई के महीने में हुई उस घटना ने उनकी ज़िंदगियां तबाह कर दीं हैं। पुलिस ने भले ही उन्हें क्लीन चिट दे दी हो लेकिन मुसलमानों को लेकर पूर्वाग्रहों से ग्रसित उस समाज ने नहीं। वहीं जिस मीडिया ने उन्हें देश के गद्दार के रूप में पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, उसने क्लीन चिट मिलने पर अपने लगाए गए आरोपों पर कोई सफाई नहीं दी।

इसके बाद यह परिवार कभी सुकून से नहीं रह पाया। घटना से पहले यास्मीन और हिना एक आउटसोर्सिंग कंपनी में काम करतीं थीं, लेकिन आरोपों के बाद उन्हें कभी नौकरी नहीं मिली।

घटना के बाद बड़ी बहन कौसर जब शॉपिंग मॉल में अपनी नौकरी पर दोबारा पहुंची तो उन्हें भी वहां से निकाल दिया गया। वे बताती हैं कि उन्होंने कई बार कहा कि पुलिस ने हमें आरोपों से मुक्त कर दिया है, लेकिन लोग उन्हें वही अख़बार दिखाते रहे जिनमें उनके खिलाफ़ बेबुनियाद ख़बरें लिखीं गईं थीं।

इसके बाद तीनों बहने कई लोगों के पास नौकरी के लिए गईं, लेकिन सभी ने ऐसा ही सुलूक किया। कौसर बताती हैं कि उनकी मां को पेंशन मिलती है, लेकिन उनकी दवा में काफी पैसे खर्च हो जाते हैं और फिर खर्च मुश्किल हो जाता है। ऐसे में राशन के लिए भी पैसे नहीं बचते और ऐसे में अब वे एक ही वक्त खाना खाती हैं ताकि महीने भर तक राशन चला सकें।

ये तीनों बताती हैं कि कई महीनों तक घर में बैठने के बाद अब घर में तंगी बढ़ चुकी है और यही वजह है कि पढ़ी-लिखी होने के बावजूद इन्होंने दिहाड़ी मज़दूरी करना भी ठीक समझा। आसपास रहने वाले किसानों ने इन्हें मदद दी। अब ये तीनों रोज़ उनके खेतों में जाती हैं और डेढ़-दो सौ रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मज़दूरी करती हैं।

कौसर, यास्मीन और हिना की ज़िद है कि अब इस रिपोर्ट में उनके नाम न छिपाए जाएं क्योंकि उनके बारे में झूठ भी ऐसे ही फैलाया गया। मां को अब अपनी तीनों बेटियों की चिंता है।

वे कहती हैं कि इस घटना से पहले दोनों बेटियों के लिए कई रिश्ते आ रहे थे लेकिन अब कोई नहीं आता और पता नहीं उनके बाद उनकी बेटियों का क्या होगा क्योंकि पेंशन उनके रहने तक ही मिलेगी।

कौसर बताती हैं कि पुलिस की क्लीन चिट से समाज की आंखें नहीं खुलतीं। वे कहती हैं कि आज भी बहुत से लोग उन्हें रोककर कभी ताना देकर तो मज़ाक में पूछ लेते हैं  कि वे पाकिस्तान से कब लौंटी।

कौसर कहती हैं कि वे इसके जवाब में मुस्कुरा देतीं हैं क्योंकि अब उनके पास समाज से कहने के लिए कुछ नहीं है जो कहना था वह मीडिया ने उनसे या किसी से भी बिना पूछे ही कह दिया है और अब उन्हें शायद ज़िंदगी भर इसका ख़ामियाज़ा भुगतना होगा क्योंकि अब उनके पास खुद का सम्मान वापिस हासिल करने के लिए न तो कोई अधिकार है और न पेट भरने के लिए रोटी।



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