नॉर्थ इंडिया में आप की धमक, कांग्रेस की उड़ाती चमक


अभी तक कांग्रेस के जनाधार पर ही आप आगे बढ़ी है लेकिन यह गति ऐसी ही चलती रही तो बीजेपी को भी नार्थ इंडिया में आप की कड़ी चुनौती का मुकाबला करना पड़ सकता है।


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अतिथि विचार Published On :
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सरयूसुत मिश्रा। 

दिल्ली म्यूनिसपल कॉर्पोरेशन (MCD) में भाजपा को सत्ता से बेदखल कर अरविंद केजरीवाल ने अपना राजनीतिक कमाल दिखा दिया है। यह पहला अवसर है जब अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी को सत्ता से उतारा है। इसके पहले आप ने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस की सरकारों को बेदखल कर सरकार बनाई थी।

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के परिणाम में केजरीवाल की पार्टी को करने के लिए बहुत कुछ नहीं है लेकिन जितना भी उनको मिलेगा वह उन्हें राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में दर्जा प्राप्त करने के लिए पर्याप्त होगा। नार्थ इंडिया में केजरीवाल की धमक लगातार बढ़ती जा रही है। इससे कांग्रेस की चमक भी कम हो रही है।

भारतीय राजनीति में कई क्षेत्रीय पार्टियां लंबे समय तक सत्ता में बनी रहीं लेकिन एक भी क्षेत्रीय राजनीतिक दल ऐसा नहीं था जिसने अपने राज्य के बाहर जाकर दूसरे राज्य में सरकार बनाने में सफलता हासिल की हो। इन दलों के बड़े-बड़े राजनेताओं ने कांग्रेस और बीजेपी का मुकाबला अपने-अपने राज्यों में किया लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर दूसरे राज्यों में जाकर वे अपने वजूद को स्थापित नहीं कर सके।

यूपी में सपा-बसपा, बिहार में जेडीयू-आरजेडी, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में डीएमके-एआईडीएमके, तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति, ओडिशा में बीजू जनता दल अपने-अपने राज्यों में सत्ता की राजनीति में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। यूपी को छोड़कर बाकी राज्यों में इन दलों की सरकारें अभी काम कर रही हैं लेकिन इनमें से कोई भी दल दूसरे राज्य में अपना अस्तित्व स्थापित नहीं कर सका।

केजरीवाल अकेले नेता हैं, जिन्होंने अपने दम पर अपने काम और विकास के मॉडल पर राजनीतिक विस्तार किया है। विकास के दिल्ली मॉडल को उन्होंने पंजाब में बेचा। अब उन्होंने गुजरात में भी इसी मॉडल पर दांव लगाया है। एमसीडी में बीजेपी को आप ने जो जबर्दस्त झटका दिया है, उसके कारण बीजेपी भविष्य की राजनीति में केजरीवाल को अब नकार नहीं सकती है।

अब केवल क्षेत्रीय पार्टियां ही नहीं, राष्ट्रीय पार्टियां भी चेहरे पर ही राजनीति को आगे बढ़ाती देखी जा सकती हैं। गांधी परिवार के बिना कांग्रेस पार्टी अपने अस्तित्व को बचाए रखने में अक्षम महसूस करती है। बीजेपी संगठन आधारित पार्टी है लेकिन वहां भी नरेंद्र मोदी का चेहरा ही बीजेपी की राजनीतिक सफलता का आधार बना हुआ है।

मोदी के पहले बीजेपी संगठन उतना ही मजबूत था लेकिन बीजेपी को राजनीतिक सफलता और केंद्र में सत्ता पर पहुंचने का मौका बहुमत के साथ पहले नहीं मिल सका था। राष्ट्रीय पार्टियों और क्षेत्रीय राजनीतिक दल किसी खास नेता के चेहरे पर ही सफलता हासिल करते दिखाई पड़ते हैं। अरविंद केजरीवाल भी वैसा ही उदाहरण देश में बनते जा रहे हैं।

आप के पास कोई संगठन नहीं है। दिल्ली से शुरू इनकी विजय यात्रा दिल्ली में उनके गवर्नेंस मॉडल पर आगे बढ़ती दिखाई पड़ रही है। अरविंद केजरीवाल दो बार विधानसभा के चुनाव भारी सीटों के साथ जीतकर मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके हैं। पहली बार विधानसभा में भारी बहुमत के बाद भी एमसीडी में उन्हें सफलता नहीं मिल सकी थी। इसके कारण दिल्ली सरकार के परफॉर्मेंस को स्थानीय स्तर पर मजबूती के साथ रखने में कठिनाई महसूस की जा रही थी।

अब अवसर आया है जब एमसीडी और दिल्ली दोनों स्थानों पर आप की सरकार होगी। दिल्ली में अब आप का डबल इंजन, विकास का केजरीवाल मॉडल स्थापित करने में सफल हो सकता है। अगर गवर्नेंस में बुनियादी सुधार और भ्रष्टाचार की संभावनाओं को समाप्त करने में केजरीवाल दिल्ली में सफल हो जाते हैं तो केजरीवाल की चुनौती बीजेपी के लिए भविष्य की बड़ी चुनौती हो सकती है।

यद्यपि स्थानीय स्तर की संस्थाओं के चुनाव विधानसभा के चुनाव और लोकसभा के चुनाव के मुद्दे अलग-अलग होते हैं। अभी तक यह साबित हुआ है कि राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव में मोदी के मुकाबले कोई नेता टिक नहीं पाया है। दिल्ली में भी बीते लोकसभा चुनाव में सभी सीटें बीजेपी ने जीती थी जबकि तब आप यहाँ विधानसभा में 70 में से 67 सीटें जीतने में सफल हुई थी।

दिल्ली में अगला विधानसभा चुनाव अब लोकसभा चुनाव के बाद होगा। एमसीडी चुनाव लोकसभा चुनाव के नतीजे के रूप में नहीं देखे जा सकते। आम आदमी पार्टी का मत प्रतिशत भी विधानसभा के मुकाबले 10% से अधिक घटा है। मतदान प्रतिशत में यह कमी आम आदमी पार्टी को भी परेशान करने वाली है।

केजरीवाल के राजनीतिक विस्तार से एक बात स्पष्ट होती है कि जनमानस गवर्नेंस में सुधार की लगातार तलाश कर रहा है। भ्रष्टाचार का मुद्दा जनता के बीच परेशान करने वाला बना हुआ है। सरकारी सिस्टम के काम करने के तरीके और परफॉर्मेंस से जनमानस असंतुष्ट दिखाई पड़ता है।

केजरीवाल के पास में न तो संगठन है और ना ही उनका कोई पारिवारिक बैकग्राउंड है। उनकी सफलता उनकी काम की शैली और परफॉर्मेंस पर ही केंद्रित है। भारतीय राजनीति को इस बात की गंभीरता से जरूरत है कि राजनीति विकास के मुद्दों पर हो। राजनीतिक दल विकास के जन हितैषी मॉडल को सामने लाएं और उनको अंजाम तक पहुंचाकर अपने-अपने मॉडल को बेस्ट स्थापित करने की लगातार कोशिश करें।

लोकतंत्र की भावना भी यही है कि विकास के मॉडल और गवर्नेंस पर जनादेश लिया जाए। दुर्भाग्य से भारत में चुनाव के समय अनावश्यक मुद्दे हावी हो जाते हैं। विकास के मुद्दे तो पीछे छूट जाते हैं। केजरीवाल को अब तक तो सफलता मिलती रही है लेकिन अब भविष्य उनके लिए भी चुनौतीपूर्ण होगा। उनमें अभी तक नयापन था, लोगों ने उनमें एक नई दृष्टि और प्रयास को देखा था। अब 10 साल बाद अगर यह नयापन नहीं रहेगा तो फिर दूसरे राजनीतिक दलों की तरह उन्हें भी जनता नकारने से चूकेगी नहीं।

राजनीतिक दृष्टि से अगर केजरीवाल का विश्लेषण किया जाए तो कई सारी गलतियां भी उन्होंने की हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से पैदा हुई उनकी पार्टी पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन निर्दोष हैं या दोषी हैं, यह सवाल नहीं है लेकिन जब उन पर आरोप लगे हैं तब जेल में रहते हुए उनको मंत्री पद पर बनाए रखना क्या भारतीय लोकतंत्र के लिए कोई शुभ संकेत कहा जाएगा?

अगले सालों में जिन राज्यों में चुनाव होना है, उनमें छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश शामिल है। इन राज्यों में बीजेपी और कांग्रेस का सीधा मुकाबला होता है। अरविंद केजरीवाल भी अगले चुनाव में इन राज्यों में ताकत के साथ चुनावी मैदान में उतर सकते हैं। केजरीवाल की पार्टी कांग्रेस के लिए बड़े संकट के रूप में खड़ी हो रही है। अभी तक कांग्रेस के जनाधार पर ही आप आगे बढ़ी है लेकिन यह गति ऐसी ही चलती रही तो बीजेपी को भी नार्थ इंडिया में आप की कड़ी चुनौती का मुकाबला करना पड़ सकता है।

(आलेख लेखक की सोशल मीडिया से साभार)