दमोह उपचुनावः विकास और दलबदल हैं दो बड़े मुद्दे लेकिन जनता की अदालत में दोनों पर सवाल


दमोह में विकास और दलबदल के मुद्दों पर चुनाव हो रहे हैं लेकिन दोनों ही मुद्दों पर सवाल हैं। विकास अगर मुद्दा है तो भाजपा के पुराने कार्यकाल और यहां के नेताओं पर गंभीर सवाल हैं और यदि मुद्दा दलबदल का है तो पिछले उपचुनाव इसे काफी हद तक झुठला चुके हैं…


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राजनीति Updated On :

भोपाल। दमोह इस बार अपने इतिहास का चौथा उपचुनाव देख रहा है हालांकि यह पहला ऐसा उपचुनाव है जो किसी विधायक के पार्टी छोड़ने के बाद हो रहा है। ऐसे में ज़ाहिर है यहां दल-बदल एक बड़ा मुद्दा है। इसे भुनाने का प्रयास कांग्रेस भी पूरी ताकत से कर रही है। वहीं भारतीय जनता पार्टी के मुताबिक मुद्दा विकास का था जिसके लिए कांग्रेस के विधायक ने पार्टी छोड़ी और उनके दल में शामिल हो गए।

दमोह की जनता के बीच ज़मीन पर ये दोनों ही मुद्दे ख़ासे गंभीर नज़र आ रहे हैं और दोनों ही पार्टियों को इन मुद्दों की काफ़ी चिंता भी है। शुरुआत दलबदल के पहले मुद्दे से करते हैं।  कांग्रेस पार्टी अपने पुराने विधायक और राहुल को बिकाऊ करार दे रही है। कांग्रेस पार्टी के पास इस मुद्दे के प्रचार के लिए दमोह विधानसभा में अगर सबसे बड़ा चेहरा है तो वह है उनके प्रतिद्वंदी खुद राहुल सिंह लोधी। मध्यप्रदेश कांग्रेस राहुल सिंह लोधी के पुराने साक्षात्कार दिखाकर उनके ख़िलाफ़ ज़ोर-शोर से प्रचार कर रही है।

राहुल सिंह इस साक्षात्कार में अपने व्यक्तित्व की ख़ूबियां गिना रहे हैं कि वे अंगद के पांव की जमे रहेंगे। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। साक्षात्कार में राहुल ने जो भी कहा अब उनकी राय उससे उलट है  और यही बात कांग्रेस अपने पक्ष में प्रचार के लिए इस्तेमाल कर रही है।

ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़ने वाले ज्यादातर विधायकों ने अपने  चुनाव चुनाव जीत लिये हैं और कई ने तो पहले से ज्यादा वोट हांसिल किये हैं ऐसे में भारतीय जनता पार्टी  इस मुद्दे को जनता से जुड़ी बात नहीं मानती। पिछले दिनों अपने यहां आए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने खुद मंच से भी इसका ज़िक्र किया था और उनके मंत्री गोविंद सिंह राजपूत और प्रभुराम चौधरी भी इसे कह चुके हैं। इन दोनों ने भी इसी तरह के आरोपों का सामना किया था लेकिन उन्हें अपने पिछले चुनाव से ज्यादा वोट मिले थे।

हालांकि राहुल की बात यहां थोड़ी अलग है और वह है पार्टी छोड़ने से पहले उनका स्वयं का साक्षात्कार जिसे कांग्रेस पार्टी भुना रही है। ज़ाहिर है कि साक्षात्कार में की गईं बातें जनता पर ज्यादा असर भी करती हैं और कांग्रेस इसे मनोवैज्ञानिक रुप से भुना रही है।

दूसरी ओर है विकास का मुद्दा जो भाजपा और कांग्रेस दोनों के पक्ष में जाता है और उनके ख़िलाफ़ भी। राहुल सिंह लोधी ने अपना पिछला चुनाव कांग्रेस पार्टी से लड़ा था तब भी उनका मुद्दा दमोह का विकास और यहां मेडिकल कॉलेज बनाना था। कमलनाथ सरकार के कार्यकाल  में  दौरान आचार संहिता लगी रही हालांकि जब आचार संहिता नहीं थी तब सरकार ने बहुत सी घोषणाएं की लेकिन उनमें से दमोह के लिए कोई बहुत महत्वपूर्ण घोषणा शामिल नहीं थी। उस समय के कांग्रेसी विधायक अक्सर आरोप भी लगाते रहे कि कमलनाथ केवल अपने निर्वाचन क्षेत्र छिंदवाड़ा में ही विकास कर रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के लिए विकास के मुद्दा कुछ कठिन साबित हो सकता है।

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि भाजपा के लिए यह मुद्दा आसान हो। यहां प्रदेश के कद्दावर मंत्री रहे जयंत मलैया चालीस वर्षों तक सर्वेसर्वा की भूमिका में रहे लेकिन इसके बावजूद 2019 के चुनावों में वे राहुल सिंह के विकास के मुद्दे के आगे चुनाव हार गए हालांकि इस दौरान  एंटी इंकमबेंसी भी एक बड़ा फैक्टर रहा।

मलैया पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने अपने क्षेत्र का विकास नहीं किया। यहां विश्वविद्यालय नहीं खोले, रोज़गार के साधन उपलब्ध नहीं करवाए। यह आरोप कुछ हद तक मजबूत भी नज़र आते हैं क्योंकि दमोह में एक सीमेंट फैक्ट्री के अलावा कोई बड़ा रोज़गार का साधन नहीं है। यही वजह है कि दमोह की एक बड़ी ग्रामीण आबादी हर साल रोज़गार के लिये पलायन करती है।  दमोह में विश्वविद्यालय खोले जाने की ख़बरें भी सुर्ख़िया बनी लेकिन ये ख़बरें भी धरातल पर नहीं आ सकीं।

अब दमोह में राहुल सिंह लोधी की मांग पर मुख्यमंत्री ने मेडिकल कॉलेज शुरु करने की बात कही है। इसका ज़िक्र बजट प्रस्ताव में भी है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने इसका भूमिपूजन भी कर दिया। चुनाव की घोषणा से पहले यह भूमिपूजन तहसील ग्राउंड के सभा मैदान में ही कर दिया गया। इसके लिए ज़मीन आवंटन का काम अभी शेष है।

दमोह में मेडिकल कॉलेज की घोषणा होने के बाद तीन पड़ोसी जिलों में तीन मेडिकल कॉलेज बन जाएंगे। छतरपुर में मेडिकल कॉलेज की घोषणा पहले ही हो चुकी है लेकिन बीच में काफी दिनों तक इसके लिए फंड नहीं दिया गया। फिलहाल यहां मेडिकल कॉलेज की जमीन ही मिल पाई है।

इस मेडिकल कॉलेज की घोषणा 2019 से पहले खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की थी। इसके बाद कांग्रेस सरकार आई। कांग्रेस सरकार में छतरपुर से  चार विधायक थे लेकिन कांग्रेस सरकार ने भी इस पर  कोई ध्यान नहीं दिया गया। सागर में बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज बन तो गया है लेकिन इसकी व्यवस्थाएं लचर रहीं और  इसे लेकर भी काफी नकारात्मक ख़बरें तक आती रहीं हैं। जिनके बाद लोग यहां की व्यवस्थाओं से निराश नज़र आते हैं। ये हाल तब है जब सागर जिले से दो मंत्री आते हैं।

इन पुराने अनुभवों के अनुसार दमोह में मेडिकल कॉलेज एक महत्वपूर्ण घोषणा है जो इस जिले का भविष्य तय कर सकती है हालांकि सरकार इसे किस तेज़ी से पूरा करती है यह देखने वाली बात होगी क्योंकि अब अगला चुनाव आने में केवल तीन ही साल शेष हैं।

ऐसे में दमोह उपचुनाव में दोनों मुद्दों पर सवाल हैं लेकिन कौन सा मुद्दा हावी है यह बात फिलहाल जनता ही जानती है और जनता फिलहाल शांत है।

 



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