MSP से 1200 रुपये प्रति क्विंटल से कम पर सरसो बेचने को मजबूर हैं किसान, यह है मुख्य वजह


विशेषज्ञों का कहना है कि इससे देश में सरसों की कीमत पर असर पड़ा और भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे चला गया। यह नीति किसी भी तरह से किसानों के हित में नहीं है। इससे किसान हतोत्साहित होंगे।


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mustard msp and farmers problems

नई दिल्ली। सरकार खाद्य तेलों के मामले में देश को आथ्मनिर्भर बनाने के लिए विशेष सरसो अभियान चला रही है ताकि सरसो की बुवाई का रकबा व उत्पादन बढ़ सके, लेकिन इसके उलट यही सरकार खाद्य तेलों के बेधड़क आयात की छूट दे रही है जिसका खामियाजा सरसो का उत्पादन करने वाले किसानों को उठाना पड़ रहा है।

देशभर की तमाम मंडियों में सरसो के भाव सरकार द्वारा घोषित एमएसपी 5450 रुपये प्रति क्विंटल से 1000-1200 रुपये प्रति क्विंटल नीचे चल रहा है और कोढ़ में खाज का काम उत्पादन की तुलना में सरसो की बेहद कम पैमाने पर सरकारी खरीद ने पूरा कर दिया है और इसकी वजह से बाजार की कीमतों पर कोई असर नहीं पड़ रहा है।

खाद्य तेलों के उत्पादकों के संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी एसईए के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि मार्च 2023 में वेजिटेबल ऑयल (खाद् एवं गैर-खाद्य तेल) का आयात 6 फीसदी बढ़कर 11,72,295 टन पर पहुंच गया है जो मार्च 2022 में 11,04,570 लाख टन था जिसमें खाद्य तेलों की हिस्सेदारी 11,35,600 टन और गैर-खाद्य तेलों की 36,693 टन रही है।

बीते पांच माह (नवंबर 2022-मार्च 2023) पर गौर करें तो वेजिटेबल ऑयल के आयात में इससे पिछले वर्ष की इसी अवधि (नवंबर 2021-मार्च 2022) के मुकाबले 22 फीसदी की बड़ी उछाल दर्ज की गई है।

2021-22 की इसी अवधि में 57,95,728 लाख टन वेजिटेबल ऑयल का आयात हुआ था जो 2022-23 में बढ़कर 70,60,193 टन पर पहुंच गया जिसमें खाद्य तेलों की हिस्सेदारी 69,80,365 लाख टन और गैर-खाद्य तेलों की 79,828 टन रही है।

इस बारे में विशेषज्ञ बताते हैं कि देश में खाद्य तेलों की इतनी बड़ी समस्या है और उस समस्या को कम करने के लिए किसानों ने पिछले साल सरसों का रिकॉर्ड उत्पादन किया।

इस साल भी रिकॉर्ड रकबे में बुवाई हुई और उत्पादन भी नए रिकॉर्ड पर पहुंचने की संभावना है तो फिर पाम ऑयल आयात करने की इजाजत क्यों दी गई। जब पता है कि रिकॉर्ड उत्पादन हो रहा है और किसानों को अच्छा भाव मिल रहा है तो इतना पाम ऑयल देश में लाने की क्या आवश्यकता थी।

विशेषज्ञों का कहना है कि इससे देश में सरसों की कीमत पर असर पड़ा और भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे चला गया। वह भी तब ऐसा किया गया जब सरसो की नई फसल बाजार में आने वाली थी। यह नीति किसी भी तरह से किसानों के हित में नहीं है। इससे किसान हतोत्साहित होंगे।

बता दें कि सरकार नैफेड के जरिये सरसो की एमएसपी पर खरीद करती है, लेकिन 4 मई तक नैफेड ने सिर्फ 4.77 लाख टन सरसो की ही खरीद की है और हरियाणा में सरकारी खरीद बंद की जा चुकी है।

नैफेड ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर जो जानकारी दी है उसके मुताबिक, 4 मई 2023 तक हरियाणा में 3,47,105 टन सरसो की खरीद हुई है जबकि सरसो के सबसे बड़े उत्पादक राज्य राजस्थान में सिर्फ 34,980.18 टन की ही खरीद हो पाई है।

मध्यप्रदेश में 71,759.97 टन और गुजरात में 23,058.56 टन सरसो की खरीद नैफेड ने की है। इतनी कम खरीद से बाजार भाव पर कैसे असर पड़ेगा यह समझना मुश्किल नहीं है।



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