आंदोलन: ख़ामोशी का स्वार्थ, कुछ मज़बूरी, कुछ लाभ


यह इस समय की एक अजीब त्रासदी है कि जब सत्ता और कारपोरेट की अपवित्र जुगलबन्दियों के खिलाफ, श्रमिकों, किसानों और छात्रों के हितों के लिये आंदोलनों की सबसे अधिक जरूरत है तो समाज का सबसे अधिक पढ़ा-लिखा, आर्थिक रूप से खाता-पीता, समाज का अगुआ वर्ग किसी भी प्रकार के आंदोलन के प्रति या तो तटस्थ या विरोधी भाव रखने लगा है।


देश गांव
उनकी बात Published On :

जिन्हें अपना पेंशन खत्म होने की कसक तो है लेकिन विरोध करने का माद्दा नहीं, जिन्हें बेहद ऊंची दरों पर टैक्स भरने में खिन्नता तो घेरती है लेकिन देश के लियेचुप रहना ही एकमात्र विकल्प लगता है, जो बच्चों की ऊंची शिक्षा के बेतरह महंगी होते जाने से हलकान तो हैं लेकिन इसके विरोध में छात्रों के आंदोलन का कोई संज्ञान तक नहीं लेते, वे किसानों के इस आंदोलन को लेकर कितने संवेदनशील होंगे, यह सहज ही आकलन किया जा सकता है।  इस पर गहरे मंथन की जरूरत है कि इस देश का पढ़ा-लिखा कामकाजी वर्ग, जिसे आमतौर पर शहरी मध्यवर्ग कहते हैं, वैचारिक तौर पर इतना दरिद्र कैसे हो गया कि आंदोलनों के प्रति उसकी संवेदनशीलता ही भोथरी हो चुकी है। उसे हर आंदोलन में कोई न कोई साजिश, कोई न कोई झोल नजर आता है।

 

मसलन, बेतहाशा फीस वृद्धि के खिलाफ अनशन-धरना करते छात्र उसे “नहीं पढ़ने वाले” और “कैम्पस में अराजकता पैदा कर अपनी राजनीति करने वाले” युवा नजर आते हैं, निजीकरण और कारपोरेटीकरण के खिलाफ हड़ताल का आह्वान करने वाले श्रमिक संगठन “विलुप्त होती प्रजाति” के भटके वामी नजर आते हैं, नागरिकता संबंधी कानूनों के विरोध में खड़े लोग देश विरोधी लगते हैं। तो…दिल्ली की देहरी पर जमे किसानों की भीड़ में उन्हें अगर सिर्फ खालिस्तानी ही नजर आते हैं, नक्सली और उपद्रवी तत्व ही नजर आते हैं, विपक्ष द्वारा प्रायोजित राजनीतिक एजेंट्स ही नजर आते हैं तो यह स्वाभाविक ही है।

बीते ढाई-तीन दशकों के दौरान हमारे समाज के एक बेहद प्रभावी तबके का जैसा मानसिक अनुकूलन किया गया है वह इन्हीं दशकों के दौरान विकसित राजनीतिक सिस्टम के लिये वरदान साबित हो रहा है।किसी भी प्रकार के आंदोलन को संदेह की नजर से देखना इस वर्ग का मनोविज्ञान बन गया है। सरकार के खिलाफ कोई आंदोलन सघन हुआ नहीं कि इनमें से अधिकतर लोग कुछ खास न्यूज चैनलों पर जम जाते हैं और उनसे प्राप्त मानसिक खुराक को ही सत्य का संधान मान कर चलने लगते हैं। ऐसे लोगों की कमी नहीं जिन्होंने सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों से सस्ती शिक्षा पा कर, सरकारी वजीफ़ा हासिल कर करियर के क्षेत्र में बेहतर मुकाम हासिल किया है लेकिन आज अपने करियर और अधिकारों के लिये आंदोलित छात्रों में उन्हें ‘देश विरोधी’ और ‘लुम्पेन’ तत्व नजर आते हैं।

यह इस समय की एक अजीब त्रासदी है कि जब सत्ता और कारपोरेट की अपवित्र जुगलबन्दियों के खिलाफ, श्रमिकों, किसानों और छात्रों के हितों के लिये आंदोलनों की सबसे अधिक जरूरत है तो समाज का सबसे अधिक पढ़ा-लिखा, आर्थिक रूप से खाता-पीता, समाज का अगुआ वर्ग किसी भी प्रकार के आंदोलन के प्रति या तो तटस्थ या विरोधी भाव रखने लगा है।

इस वर्ग ने स्वयं की आंदोलन धर्मिता खो कर अपना कितना अहित किया है, अपनी आने वाली पीढ़ियों की राह में कितने कांटे बोए हैं, इस पर न जाने कितना कुछ कहा जाता रहा है। लेकिन, इससे भी अधिक खतरनाक है कि कारपोरेट हितैषी सत्ता से अपने वाजिब हितों के लिये लड़ते, आंदोलित होते समुदाय उन्हें एकदम से ‘देश विरोधी’ तक नजर आने लगते हैं। जेएनयू और यादवपुर जैसे विश्वविद्यालयों के आंदोलनरत छात्रों को तो बाकायदा ‘देशद्रोही’ तत्वों के हाथों में खेलने वाला करार देने में इन्हें कोई हिचक नहीं हुई।

इनमें हर जाति-समुदाय के लोग हैं, लेकिन इनका एक विशिष्ट सा वर्ग बन गया है जो मुख्यतः शहरी सवर्ण मध्यवर्गीय मानसिकता से प्रेरित है। ऐसा माइंडसेट…जो खास तौर पर बीते ढाई-तीन दशकों के काल-क्रम में विकसित हुआ है। इस माइंडसेट के लिये किसानों की आत्महत्याएं एक रूटीन खबर है, ऊंची तकनीकी शिक्षा का गरीबों की पहुंच से बाहर हो जाना कोई विमर्श का मुद्दा नहीं, निजीकरण जिनके लिये एक तार्किक कदम है, बशर्त्ते यह उनके विभाग या संस्थान का न हो रहा हो। वैचारिक दरिद्रता इन्हें विरासत में नहीं मिली है बल्कि इन्होंने इसे बाकायदा ‘अर्जित’ किया है। तभी, जो इनके पिताओं और दादाओं के लिये रोल मॉडल थे वे इनके लिये इतिहास के खलनायक हैं जिन्होंने “70 सालों में देश का बंटाधार कर दिया है”।

इनमें एक विशिष्ट वर्ग ऐसा भी है जो जीवन भर सरकारी नौकरी के तमाम विशेषाधिकार भोगते हुए अब अपनी नौकरी से रिटायर हो चुका है और अपनी ‘ओल्ड पेंशन’ की सुविधा के तहत ऊंची राशि प्रतिमास उठाने की गारंटी हासिल किए हुए है, लेकिन ठेका और आउटसोर्सिंग की प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोग उसे ऐसे ‘गैरजिम्मेदार वामी’ लगते हैं जिन्हें “देश की नहीं, बल्कि अपनी स्थायी नौकरी की चिंता है”।

पता नहीं, इनके लिये ‘देश’ की परिभाषा क्या है, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि इनके ‘देश’ में खुद की विरासत से बेदखली का विरोध करते आदिवासी सीधे नक्सली ठहरा दिए जाते हैं, शिक्षा के कारपोरेटीकरण के खिलाफ आवाज उठाते गरीब छात्र ‘लुम्पेन’ और ‘भटके हुए’ नजर आने लगते हैं, श्रम अधिकारों के लिये लड़ते श्रमिक इनके लिये ‘अराजकतावादी’ हैं। इनका देश सिर्फ इनके लिये है जहां इन्हें तमाम सुविधाएं चाहिये। डीए की ऊंची किस्तें चाहिये, कंज्यूमर लोन में ब्याज की छूट चाहिये, सस्ते मजदूर चाहिये, दुनिया की हर सुविधाएं चाहिये और तुरत-फुरत चाहिये।

यह अलग बात है कि इनमें से अधिकतर अच्छी आमदनी के बावजूद आर्थिक रूप से बेहाल हैं क्योंकि बच्चों को ऊंची और महंगी शिक्षा दिलाने के क्रम में इन्हें लूट लिया गया है, बीमार पड़ने पर मंहगे अस्पतालों ने इनकी जेब ही नहीं, इनके संचित धन पर भी डाका डाल दिया है, उपभोक्तावाद के निर्मम दौर में जिनकी जरूरतें खत्म ही नहीं होतीं…और…जिस सिस्टम के जयकारे में ये दिन रात लगे रहते हैं वह इतिहास की सबसे ऊंची दर पर इनसे टैक्स भी वसूल रहा है। विचारहीनता अक्सर रीढ़ की हड्डी को कमजोर कर देती है। इतनी कमजोर कि उसके सीधे तन कर खड़े होने की अधिक संभावना नहीं रह जाती।

जिनकी रीढ़ की हड्डी सीधी हो ही नहीं सकती वे आंदोलन क्या करेंगे। वे तो विचारहीनता का उत्सव मनाएंगे। उनके ड्राइंग रूम्स विचारहीनता की उत्सवस्थली हैं जहां किसानों, मजदूरों, छात्रों और वंचितों के प्रति संवेदनहीनता का आख्यान रचा जाता है, जहां प्रायोजित मीडिया का जहरीला खेल अपनी सफलता का जश्न मनाता है। जो बहुत कुछ समझते भी अपने शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने की आन्दोलनधर्मिता खो चुके हैं, जो अपने जवान होते बच्चों के लिये विकट होते संसार की रचना में उपकरण बन चुके हैं, उनसे किसी भी आंदोलित जमात को कोई उम्मीद ही क्यों रहे। है भी नहीं।

(हेमंत कुमार झा के फेसबुक पेज से साभार)