कांग्रेस के गढ़ में भाजपा को जिताने वाले रामकिशोर शुक्ला कर रहे घर वापसी!


फिर बाहरी नेता को टिकट देने की तैयारी में है भाजपा और प्रदेश नेतृत्व, स्थानीय वरिष्ठ नेताओं की जरूरत केवल वोट लेने तक हुई सीमित


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राजनीति Updated On :

विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी के 40 से अधिक नेता कांग्रेस ज्वाइन कर चुके हैं और अब इस गिनती में इंदौर से भी एक नाम जुड़ सकता है। ये नाम जमकर वोट दिलाने वाला है और महू विधानसभा से कैलाश विजयवर्गीय और उषा ठाकुर जैसे नेताओं की जीत के लिए जिम्मेदार रहा है लेकिन लगातार अनदेखी ने अब पार्टी के खिलाफ जाने के बाद मजबूर नजर आ रहा है। महूगांव क्षेत्र के नेता रामकिशोर शुक्ला के बारे में खबर है कि वे कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। बुधवार दिन भर खबर बनी रही कि शुक्ला भोपाल में हैं और वे कमलनाथ से मिल सकते हैं। हालांकि इस बात की पुष्टी फिलहाल नहीं की जा सकती लेकिन यह बात पुष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी में शुक्ला को उनके कद के मुताबिक जगह नहीं दी गई और एक तरह से उन्हें बाहरी की तरह देखा गया।

महू विधानसभा में इस बार भारतीय जनता पार्टी की ओर से स्थानीय प्रत्याशी का मांग हो रही है। इसे लेकर पिछले दिनों खूब पोस्टर भी लगाए गए। यहां के लोगों के मुताबिक स्थानीय विधायक और मंत्री उषा ठाकुर ने स्थानीय नेताओं की राजनीति खत्म कर दी है और अब स्थानीय नेतृत्व के लिए आगे बढ़ने की गुंजाइश लगातार खत्म होती जा रही है।

मुख्यमंत्री की पसंद का उम्मीदवार

महूगांव क्षेत्र के नेता रामकिशोर शुक्ला पुराने कांग्रेसी ही हैं वे करीब दो दशक पहले भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे और तब से महूगांव से भाजपा को जीत दिलाते आ रहे हैं। उनके इलाके से पार्टी को निर्णायक वोट मिलते हैं और ये वोट ही जीत तय करते हैं। दो बार कैलाश विजयवर्गीय और पिछली बार उषा ठाकुर। इस बार शुक्ला उम्मीद लगाए बैठे थे कि उन्हें टिकिट मिलेगा लेकिन बताया जाता है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह नहीं चाहते कि किसी स्थानीय उम्मीदवार को महू से टिकिट मिले।

मुख्यमंत्री की पसंद इंदौर से आने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े चिकित्सक डॉ. निशांत खरे हैं। खरे मूलतः सागर के रहने वाले हैं और पिछले कुछ वर्षों में उनकी राजनीतिक सक्रियता काफी बढ़ी है। वे बीते साल ही महू में सक्रिय हुए हैं और अब टिकिट के दावेदार भी बन गए हैं। ऐसे में रामकिशोर शुक्ला, राधेश्याम यादव, अशोक सोमानी और कंचन सिंह चौहान जैसे नेता पार्टी के लिए फिर वोट बटोरने के काम करेंगे। इन नेताओं के करीबियों को इससे खासी नाराजगी है। उनके मुताबिक महू विधानसभा में बाहरी प्रत्याशियों का कोई जनाधार नहीं होता और स्थानीय नेता ही उनके लिए काम करते हैं लेकिन जीत के बाद स्थानीय नेतृत्व को भुला दिया जाता है।

गोली कांड को ठंडा किया

बताया जाता है कि मुख्यमंत्री शिवराज की पसंद डॉ. निशांत खरे इसलिए बन गए हैं क्योंकि उन्होंने महू में पुलिस की गोली से आदिवासी युवक की मौत के मामले को हल करने में मदद की। डॉ. खरे ने ही भाजपा और संघ के संगठन की मदद से आदिवासी समाज के विरोध को ठंडा करवा दिया। ऐसे में स्थिति ये बन गई कि मुख्यमंत्री को इस मामले में कोई खास विरोध नहीं झेलना पड़ा। स्थानीय भाजपा नेताओं का कहना है कि ऐसे में मुख्यमंत्री एक तरह से डॉ. खरे को इनाम दे रहे हैं। उल्लेखनीय है कि आदिवासी युवकी की मौत के मामले में अब तक कोई खास कार्रवाई नहीं की गई है।

एक स्थानीय भाजपा नेता ने गोपनीयता के अनुरोध पर बताया कि मुख्यमंत्री का यह तरीका सही नहीं है। वे किसी राजा की तरह व्यवहार कर रहे हैं। महू के प्रत्याशी के निर्णय का अधिकार उन्हें नहीं, महू के नेता, यहां जनता को होना चाहिए।

उषा ठाकुर के कार्यकाल में बढ़ी नाराजगीः  कैलाश विजयवर्गीय के विधायक कार्यकाल के दौरान भी यह बातें उठतीं थी लेकिन उस समय नाराजगी इस कदर नहीं है जैसी इस बार नजर आ रही है। पार्टी के सभी आंतरिक सर्वे में मौजूदा विधायक की स्थिति खराब है और यह बात पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक भी पहुंच चुकी है लेकिन अब स्थानीय नेतृत्व को तरजीह देने के बजाए पार्टी फिर यहां से बाहरी प्रत्याशी को देख रही है।

कविता पाटीदार को मिले सबसे ज्यादा मौकेः ऐसा भी नहीं है कि भाजपा संगठन ने स्थानीय नेतृत्व को बिल्कुल आगे नहीं बढ़ाया। लेकिन इस दौरान तरजीह केवल एक ही  नेता को दी गई। पिछले साल अचानक पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष कविता पाटादीर को राज्यसभा सदस्य बना दिया गया।  वे सीधे राज्यसभा पहुंची और इसी दौरान उन्हें संगठन में भी कई तरह के पद दे दिए गए हैं। कुछ साल पहले तक महू की राजनीति में कोई खास हैसियत न रखने वालीं पाटीदार अब भाजपा के पोस्टरों में शीर्ष नेताओं के साथ नजर आ रहीं हैं। इन नेताओं में वे प्रदेश से  इकलौता महिला चेहरा हैं।  कविता का कद जब बढ़ाया जा रहा था, ठीक उसी समय कभी कांग्रेस का अभेद किला रही महू विधानसभा में भाजपा को जमाने वाले नेताओं की हैसियत धीरे-धीरे कम की जा रही थी। इन नेताओं की अब वो अहमियत नहीं रही जो पहले कभी हुआ करती थी।

 

कभी जिताने वाले अब हार रहे…

अशोक सोमानी

पूर्व जिलाध्यक्ष अशोक सोमानी की बात करें तो वे अब बहुत कम बार ही सार्वजनिक कार्यक्रमों में नजर आते हैं। सोमानी ज्यादातर बार अपने गांव भगोरा और आसपास ही रहते हैं। सोमानी का कद पंचायत चुनावों में असफलता के बाद कम होता गया। हालांकि कभी ये नेता भाजपा को जिताने वाले अहम घटकों में शामिल थे। इसके अलावा

राधेश्याम यादव

दूसरा नाम राधेश्याम यादव का है। यादव, जनसंघ के जमाने वाले नेता हैं। अब तक दोनों भाजपा विधायकों के चुनावों की बागडोर थामे रहे हैं लेकिन अब खुद इच्छा रखते हैं  और पिछले दिनों स्थानीय उम्मीदवार की मांग भी उठा चुके हैं। हालांकि भाजपाईयों के मुताबिक उनके पास बहुत अधिक वोट बैंक नहीं है।

कंचन सिंह चौहान

तीसरे नेता कंचन सिंह चौहान हैं, पिछले दिनों तक वे उषा ठाकुर की परछाई की तरह उनके साथ महू और भोपाल तक रहे। इस वजह से काफी चर्चाओं में भी रहे लेकिन जनता पर ठाकुर के नकारात्मक प्रभाव का असर उन पर भी बताया जाता है। वहीं उनका एक कमजोर पहलू ये भी है कि उनके पास भी कोई बहुत मजबूत वोटबैंक नहीं है। चौहान के गांव में उनके प्रतिद्वंदि भी भाजपा में अच्छा कद रखते हैं और क्षेत्र में सक्रिय हैं। ऐसे में इनका भी डर कम नहीं है।

राम किशोर शुक्ला

इनके बाद चर्चा करते हैं  राम किशोर शुक्ला की। महूगांव नगर परिषद एक तरह से शुक्ला का गढ़ मानी जाती है। हालांकि बीते कुछ वर्षों में उनके बहुत से प्रतिद्वंदी खड़े हुए हैं हालांकि ये सभी भाजपा से ही हैं और कभी शुक्ला के करीबी हुआ करते थे। इलाके में शुक्ला की अच्छी कसी हुई पकड़ है और नगर पालिका के वे अघोषित अध्यक्ष की तरह रहे हैं। बीते कार्याकाल में उनकी पत्नी यहां की अध्यक्ष रहीं हैं।



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