उपचुनाव के दौरान ही कांग्रेस से भाजपा में वापस आए डॉ. गुलाब सिंह किरार


मध्यप्रदेश में पूर्व मंत्री और किरार महासभा के अध्यक्ष डॉ. गुलाब सिंह किरार भाजपा में वापस आए हैं। चुनाव के ठीक पहले डॉ. किरार का जाना कांग्रेस पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं बताए रहे हैं। उनके जाने से पार्टी को ग्वालियर चंबल क्षेत्र में किरार समाज की वोटों का नुकसान होने की आशंका है।


Kumar Manish
राजनीति Updated On :
Dr. Gulab Singh Kirar

भोपाल। मध्यप्रदेश में 6 महीने पहले शुरू हुआ दलबदल का सिलसिला अब तक थमा नहीं है। अब पार्टी से नाराजगी के कारण कांग्रेस के एक अन्य नेता अब भाजपा में आ गए हैं। इस बार पूर्व मंत्री और किरार महासभा के अध्यक्ष डॉ. गुलाब सिंह किरार भाजपा में वापस आए हैं।
बता दें कि डॉ. किरार पिछली बार विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए थे और अब उन्होंने मौका देखकर वापस भाजपा में जाने का फैसला किया है।

चुनाव के ठीक पहले डॉ. किरार का जाना कांग्रेस पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं बताए रहे हैं। उनके जाने से पार्टी को ग्वालियर चंबल क्षेत्र में किरार समाज की वोटों का नुकसान होने की आशंका है।

रविवार को डॉ. किरार ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। रविवार को मुख्यमंत्री चौहान सुमावली विधानसभा के एक कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं से मिलने पहुंचे थे।

डॉक्टर गुलाब सिंह किरार भाजपा सरकार में राज्य मंत्री का दर्जा रखते थे और मध्यप्रदेश पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य भी थे।
किरार को मुख्यमंत्री चौहान के काफी करीबी लोगों में गिना जाता है लेकिन व्यापमं घोटाले में उनका नाम आने के बाद उन्हें भाजपा से निलंबित कर दिया गया था। डॉ. किरार पर आरोप था कि उन्होंने व्यापमं घोटाले में फ़र्ज़ी तरीके से अपने बेटे शक्ति सिंह किरार को प्री-पीजी-2011 परीक्षा में ग्यारहवीं रैंक दिलाई।
इसके बाद उनपर एसआईटी ने 2014 में केस दर्ज किया था। गिरफ्तारी से बचने के लिए डॉक्टर किरार कई महीनों तक फरार रहे और उन पर एसआईटी के द्वारा पांच हजार रुपए का इनाम भी घोषित किया गया था। इस दौरान भाजपा ने उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया था। साथ ही उनसे सभी प्रकार के पद छीन लिए गए थे।

प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनने के बाद किरार ने राहुल गांधी के सामने कांग्रेस की सदस्यता ली थी। व्यापमं घोटाले के आरोपी किरार को इस तरह पार्टी में स्वीकारने के कारण उस समय कांग्रेस की काफी आलोचना भी हुई थी।



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