बीजेपी की खंडवा रैली में जीवन सिंह की मौत के बहाने सिंधिया को कौन निपटाना चाहता है?


तथ्‍यों के हिसाब से देखें तो चांदपुर निवासी जीवन सिंह भाजपा की रैली में आये थे जहां ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया का भाषण होना था। जीवन सिंह को जब दिल का दौरा पड़ा और कुर्सी पर बैठे बैठे ही उनकी मौत हुई, उस वक्‍त तक सिंधिया रैली में नहीं पहुंचे थे।


देश गांव
राजनीति Published On :

खंडवा में रविवार को हुई भारतीय जनता पार्टी की रैली में दिल का दौरा पड़ने से गुज़र गये 80 साल के किसान जीवन सिंह की मौत का ठीकरा ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया के सिर पर फोड़ना किसकी राजनीति है?

तथ्‍यों के हिसाब से देखें तो चांदपुर निवासी जीवन सिंह भाजपा की रैली में आये थे जहां ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया का भाषण होना था। जीवन सिंह को जब दिल का दौरा पड़ा और कुर्सी पर बैठे बैठे ही उनकी मौत हुई, उस वक्‍त तक सिंधिया रैली में नहीं पहुंचे थे।

किसान की मौत के वक्‍त भाजपा विधायक राम डंगोरे का भाषण चल रहा था। मौत की खबर फैलने के बावजूद भाजपा ने अपना कार्यक्रम नहीं रोका, न ही उसके नेताओं ने अपने भाषण रोके। इससे भी बुरा यह हुआ कि मृतक के आसपास बैठे लोग अपनी जगह छोड़ कर उठ गये। खुद राम डंगोरे ने केवल सभा की फोटो लगायी, लेकिन उसमें किसान की मौत का जिक्र तक नहीं किया।

हकीकत यह है कि रैली के स्‍थानीय आयोजक और मंच पर मौजूद स्थानीय भाजपा नेताओं ने अपने ही एक बुजुर्ग कार्यकर्ता की मौत का मज़ाक बनाया और मौत का पता चलने के बाद उसकी लाश को कपड़ों से ढंक कर भाषणबाज़ी को जारी रखा।

बताया गया है कि जीवन सिंह खुद भाजपा का एक कार्यकर्ता हुआ करता था।

इस तमाम घटनाक्रम के बाद सिंधिया जब रैली में पहुंचे तो उन्‍हें इस बुजुर्ग की मौत की ख़बर मिली। उन्‍होंने बुजुर्ग को श्रद्धांजलि देने के लिए दो मिनट का मौन रखा।

प्रेस ट्रस्‍ट द्वारा जारी खबर में मुंदी थाने के प्रभारी अंतिम पवार के हवाले से बताया गया है कि जीवन सिंह को अस्‍पताल ले जाया गया जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। पवार के अनुसार शुरुआती जांच में पता चला है कि मौत दिल का दौरान पड़ने से हुई।

एमपी कांग्रेस ने शायद ठीक ही किया कि उसने अपने आधिकारिक ट्वीट में सिंधिया का नाम नहीं घसीटा। यहां तक कि पीटीआइ द्वारा जारी अरुण यादव के बयान में भी सिंधिया को नहीं, भाजपा को दोषी ठहराया गया है, लेकिन कांग्रेस के कुछेक नेताओं सहित समूचे मीडिया ने एकतरफा तरीके से सिंधिया को इस किसान की मौत के साथ जोड़ दिया है।

सिंधिया ने भी बाद में दो ट्वीट कर के वस्‍तुस्थिति को स्‍पष्‍ट किया कि उन्‍हें सभास्‍थल पर पहुंचने के बाद मौत की ख़बर मिली।

फिर सवाल उठता है कि मौत की समूची घटना कसे सिंधिया के नाम से जोड़ कर क्‍या राजनीति की जा रही है? यदि हां, तो यह राजनीति कौन कर रहा है?

रविवार को इस घटना से जुड़ी तमाम मीडिया प्रतिष्‍ठानों पर चली खबरों के शीर्षक देखिए। इसका जवाब वहां छुपा है। अधिकतर खबरों में बेशक इस बात का जिक्र है कि सिंधिया रैली में बाद में पहुंचे और उन्‍होंने दो मिनट का मौन रखा, लेकिन खबरों के शीर्षक को इस तरह से पेश किया गया है जिससे यह आभास होता है कि सिंधिया की मौजूदगी में जीवन सिंह की मौत हुई।

बड़े मीडिया संस्‍थानों के कुछ पत्रकारों ने तो बिलकुल गलत रिपोर्ट किया है कि सिंधिया के भाषण के दौरान जीवन सिंह को दिल का दौरा पड़ा। जाहिर है, इनके ट्वीट को आधार बनाकर गलत खबरें चलायी गयीं।

चूंकि इन खबरों से न तो कांग्रेस को कोई दिक्‍कत है और न ही भाजपा को- क्‍योंकि भाजपा के लिए सिंधिया अब भी आउटसाइडर ही हैं- लिहाजा इस मसले को पर्याप्‍त हवा देने की दोनों ओर से छूट दी जा रही है जिससे एक किसान की मौत पूरी तरह राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही है।

सिंधिया के सिर पर ठीकरा फोड़ने का एक लाभ भाजपा को साफ़ है कि उंगलियां शिवराज की तरफ नहीं उठेंगी। कांग्रेस इस कमजोरी को समझती है इसलिए उसने मामले को राजनीतिक बना दिया है। मीडिया उसे हवा दे रहा है। वैसे भी कांग्रेस ने इस चुनाव में लगातार सिंधिया को ही केंद्र में रखा है।

सिंधिया खानदान गद्दार है, रानी झांसी की मौत का जिम्मेदार है: आचार्य प्रमोद कृष्णम

कांग्रेस मैनिफेस्टो: सिंधिया से दुश्मनी साधने के चक्कर में राहुल गांधी को भूल गये कमलनाथ

कुल मिलाकर जीवन सिंह की मौत में सिंधिया का दोषी ठहराया जाना तथ्‍यात्‍मक रूप से गलत होने के बावजूद राज्‍य में कांग्रेस और भाजपा के लिए यह सुविधा की राजनीति का खेल है लेकिन सिंधिया ने भाजपा में रहते हुए चुनावी मंच से मौन रख के कांग्रेसी परंपरा का ही निर्वहन किया है।



Related