यूपी, बिहार और झारखंड के कई बहुजन संगठनों ने की ‘भारत बंद’ को सफल बनाने की अपील


कृषि कानूनों का विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। देशभर में अलग-अलग जगहों पर इस आंदोलन को समर्थन मिलने की खबरें लगातार आ रहीं हैं। अब यूपी, बिहार और झारखंड के कई सामाजिक और छात्र संगठन भी इस विषय पर किसानों का साथ देते नजर आ रहे हैं। इन संगठनों ने भारत बंद को सफल बनाने की अपील की है। विभिन्न संगठनों द्वारा भारत बंद को सफल बनाने के लिए यह अपील जारी की गई है…


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किसान आंदोलन


किसानों के भारत बंद को बिहार,यूपी और झारखंड के कई एक बहुजन संगठनों ने सक्रिय समर्थन दिया है। इन संगठनों ने जारी किसान आंदोलन के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए  8 दिसंबर के भारत बंद में सड़क पर उतरने का एलान किया है। रिहाई मंच के राजीव यादव, बिहार के चर्चित बहुजन बुद्धिजीवी डॉ.विलक्षण रविदास, सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के रिंकु यादव व रामानंद पासवान, झारखंड जनतांत्रिक महासभा के दीपक रणजीत,सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के गौतम कुमार प्रीतम, अब-सब मोर्चा (बिहार) के संस्थापक हरिकेश्वर राम, बिहार फुले-अंबेडकर युवा मंच के अजय कुमार राम, बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन (बिहार) के सोनम राव, अतिपिछड़ा अधिकार मंच (बिहार) के नवीन प्रजापति व सौरव तिवारी की ओर से साझा बयान जारी किया गया है।

बयान:

नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा अलोकतांत्रिक तरीके से थोपे गये तीनों कृषि कानून कॉरपोरेट हितैषी व किसान विरोधी हैं। इन कानूनों से खेती-किसानी बर्बाद होगा। देशी-विदेशी कंपनियों व पूंजीपतियों का कृषि पर कब्जा होगा। बटाईदार किसान और खेतमजदूर भी तबाह होंगे और बेरोजगारी बढ़ेगी।

किसान कॉरपोरेटों का गुलाम बन जाएंगे। आत्मनिर्भरता की बात करने वाली मोदी सरकार किसानों को गुलामी की ओर धकेल रही है, मुल्क को गुलाम बना रही है। लंबे समय से किसान लागत के डेढ़ गुना कीमत पर अनाज की सरकारी खरीद की गारंटी की मांग कर रहे हैं। लेकिन नए कानूनों से एपीएमसी जैसी कृषि संस्थाएं ही बर्बाद होगी। न्यूनतम समर्थन मूल्य की अवधारणा ही खत्म हो जा रही है।

इन कानूनों से खाद्य सुरक्षा के बजाय खाद्य असुरक्षा ही बढ़ेगी, भूखमरी का भूगोल बढ़ेगा। जनवितरण प्रणाली खत्म हो जाएगी। आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कालाबाज़ारी-जमाखोरी बढ़ेगी। बाजार में खाद्य पदार्थों की बनावटी कमी पैदा किया जाएगा व खाद्य पदार्थ महंगे होंगे। पूंजीपति सस्ते दर पर किसानों का उत्पाद खरीदेंगे और फिर महंगा बेचेंगे। उन्हें मुनाफा लूटने की छूट मिलेगी।

कृषि गहरे संकट में है। कृषि व किसानों को इस संकट से उबारने के लिए कृषि बजट और किसानों की सब्सिडी में बढ़ोतरी, किसानों को कर्ज मुक्त करने, लाभकारी मूल्य देने सहित पिछले दो दशकों से धूल फांक रही स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों को लागू करने की जरूरत है। किसान इन सवालों पर आवाज बुलंद करते रहे हैं। लेकिन इस संकट को देशी-विदेशी कंपनियों व कॉरपोरेटों के लिए अवसर बनाया जा रहा है।

कोरोना महामारी के आपदा को नरेन्द्र मोदी सरकार ने मेहनतकशों-बहुजनों पर हमले के विशेष अवसर में बदल दिया। कृषि संबंधी तीन कानूनों को थोपने के साथ मजदूरों को भी बंधुआ हालात में धकेल देने और पूंजीपतियों को मनमानी की छूट देने के लिए श्रम कानूनों को बदल दिया है। निजीकरण की गति भी बढ़ा दी गई है। इसी बीच मंत्रिमंडल ने शिक्षा के क्षेत्र में भी निजीकरण को आगे बढ़ाने नई शिक्षा नीति-2020 के ड्राफ्ट को पास किया। यह शिक्षा नीति सामाजिक न्याय विरोधी-बहुजन विरोधी है। कुल मिलाकर सब कुछ देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हवाले करने और सामाजिक न्याय को भी ठिकाने लगाने की मुहिम आगे बढ़ रही है। ब्राह्मणवादी जातिवादी, सांप्रादायिक व पितृसत्तावादी हिंसा और लोकतांत्रिक आवाज का दमन भी बढ़ रहा है।

ब्राह्मणवाद व पूंजीवाद के गठजोड़ के बीच सवर्ण वर्चस्व और देशी-विदेशी पूंजीपतियों के द्वारा देश के संपत्ति-संसाधनों पर कब्जा आगे बढ़ रहा है। आर्थिक संकट और पूंजीपति पक्षधर नीतियों की मार भी बहुजनों पर ही ज्यादा पड़ती है। अंतिम तौर पर बहुजनों की चौतरफा बेदखली के साथ सामाजिक-आर्थिक गैर बराबरी बढाया जा रहा है। सत्ता-शासन की संस्थाओं, शिक्षा, संपत्ति-संसाधनों में बहुजनों की आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी पहले से ही कम है। संविधान में दर्ज सबको सामाजिक-आर्थिक न्याय के विपरीत संविधान को तोड़-मरोड़ कर फिर से मनुविधान और लोकतंत्र को कमजोर कर तानाशाही थोपा जा रहा है।

ब्राह्मणवाद व कॉरपोरेट के जुगलबंदी व हमले के बीच किसानों की साहसिक लड़ाई का हम बहुजन संगठनों की ओर से क्रांतिकारी अभिनंदन करते हैं। किसान शहीदों को सलाम करते हैं। किसानों के आंदोलन के साथ एकजुटता और 8दिसंबर के भारत बंद में सक्रिय तौर पर सड़क पर उतरने का एलान करते हैं। हम तमाम बहुजन संगठनों और बहुजन समाज से किसान आंदोलन के साथ मजबूत एकजुटता और भारत बंद को ऐतिहासिक बना देने की अपील करते हैं। हम मानते हैं कि किसानों की लड़ाई बहुजनों की लड़ाई है। संविधान व लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है। बहुजन आंदोलन को किसान आंदोलन के साथ पूरी ताकत से खड़ा होने की जरूरत है।

आइए, तीनों काले कृषि कानूनों को रद्द करने के साथ-साथ प्रस्तावित बिजली बिल-2020 की वापसी, न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी हक बनाने, स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने, बटाईदारों को कानूनी सुरक्षा व अधिकार देने, भूमि सुधार सहित संविधान व लोकतंत्र की रक्षा के सवालों पर जोरदार आवाज बुलंद करें।

रिहाई मंच

सामाजिक न्याय आंदोलन

झारखंड जनतांत्रिक महासभा

सोशलिस्ट पार्टी-इंडिया

अब-सब मोर्चा

फुले-अंबेडकर युवा मंच

बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन

अतिपिछड़ा अधिकार मंच



 



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