मैनिट प्रशासन पर शोधार्थियों के गंभीर आरोप, यहां जारी है आमरण अनशन

देश गांव
उनकी बात Published On :
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भोपाल। देश के प्रख्यात शैक्षणिक संस्थानों में से एक मौलाना आज़ाद नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी में विद्यार्थी नाराज़ हैं और वे अब आंदोलन कर रहे हैं। मैनिट के इन पीएचडी स्कॉलर्स ने सोमवार से देशव्यापी शोधार्थी उद्घोष महाआंदोलन की शुरुआत की है। यह आंदोलन फैलोशिप के लिए है।

शोधार्थियों का कहना है कि कोविड-19 महामारी के तुरंत बाद मैनिट प्रशासन ने पीएचडी स्कॉलर्स को एससीआई, एससीआईई रिसर्च जर्नल में क्यू 1, क्यू 2 क्लास के रिसर्च पेपर्स प्रकाशित करने पर ही तीन साल बाद फेलोशिप देने का नियम बनाया है जबकि केंद्र सरकार द्वारा पीएचडी स्कॉलर्स को पूरे पांच साल तक फेलोशिप दी जाती है।

इन शोधार्थियों ने मैनिट प्रशासन पर कई तरह के आरोप लगाए हैं। इनमें रिसर्च सुपरवाइजर की मनमानी करने और बौद्धिक शोषण. केंद्र सरकार के नियमों के खिलाफ जाकर विद्यार्थियों से फीस वसूलने जैसे आरोप भी शामिल हैं।

शोधार्थियों का कहना है कि मैनिट ने कोविड महामारी के बाद नियम कड़े कर दिये हैं जबकि इन्हें शिथिल किए जाने की आवश्यक्ता थी। शोधार्थियों की मांग है कि एमटेक और पीएचडी कर रहे शोधार्थियों की फेलोशिप में 62 फीसदी की बढ़ोतरी की जाए।

मैनिट के एक शोधार्थी ने अपने रिसर्च सुपरवाइजर पर आरोप लगाया कि सुपरवाइजर ने उनके रिसर्च पेपर में अपने नाम के साथ दोस्तों का नाम भी छपवाने का भी दबाव बनाया। इसके बाद शोधार्थी तन्मय शुक्ला दो हफ्तों से आमरण अनशन पर बैठे  हैं। उन्होंने अपना सुपरवाइजर बदलने की मांग की है।

मैनिट के शोधार्थी रिसर्च सुपरवाइजर की योग्यताओं पर भी सवाल उटा रहे हैं। उनका कहना है कि सुपरवाइजर के खुद के रिसर्च पब्लिश होने चाहिए थे, लेकिन कई सुपरवाइजर इस अनिवार्य शर्त को भी पूरा नहीं करते। पीएचडी ऑर्डिनेंस के हिसाब से कई सुपरवाइजर्स पीएचडी के विद्यार्थी लेने के लिए पात्र ही नहीं है।

शोधार्थियों का कहना है कि मैनिट प्रशासन तानाशाही रवैया अपनाता है और बीच सत्र में कोई भी नया नियम उन पर थोप देता है। यही नहीं शोधार्थियों से घरेलू काम भी करवाए जाते हैं।