इंदौर के चोरल गांव की महिलाओं ने लिखी आत्मनिर्भर भारत की एक नई कहानी


चोरल की इन महिलाओं की मेहनत को इंदौर के नेकदिल शहरियों का साथ भी मिला है। इसका असर यह हुआ कि चोरल की झालर खरीदने के लिए करीब पचास किलोमीटर दूर शहर के दूसरे छोर विजय नगर से भी लोग यहां पहुंच गए। कॉर्पोरेट भी आगे आए। पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र की आयशर ग्रुप और मोयरा स्टील जैसी बड़ी कंपनियों ने भी सहयोग दिया।



इंदौर। कोरोना काल के दौरान और इसके बाद बनी कठिन परिस्थितियों में कुछ महिलाओं ने आत्मनिर्भरता का एक कामयाब मॉडल तैयार किया है। चोरल गांव की इन महिलाओं ने इस साल पांच हज़ार से अधिक झालरें बनाकर बेची हैं। इस बार भरपूर मांग रही और दीपावली के एक दिन पहले तक इन झालरों की बिक्री जारी रही।

महिलाओं ने इससे करीब एक लाख रुपये कमाए हैं। इन महिलाओं का कहना है कि उनकी दीपावली इस आत्मनिर्भरता के अहसास से कुछ और ज़्यादा रोशन हो गई हैं। दीपावली पर इंदौर शहर और यहां के गांवों के कई घर इन महिलाओं की बनाई हुई झालरों से रोशन हो रहे हैं।

चोरल की इन महिलाओं ने अपने इस प्रयास से एक साथ दो संदेश दिये हैं। इन्होंने चीनी सामान के आगे संभावनाएं भी खोजी हैं और एक साथ आकर अपने दम पर सीमित संसाधनों के साथ आमदनी कमाने की गुंजाइश भी खोज ली है।

ये महिलाएं जहां आत्मनिर्भर भारत की एक कामयाब कहानी बन रहीं हैं तो वहीं इन्हें खरीदने वाले लोग लोकल फॉर वोकल यानी स्थानीय सामान को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।

इस स्वसहायता समूह में साठ महिलाएं हैं। इनमें रंजना पाठक, कमला बाई और ललिता बाई भी हैं। इन महिलाओं का आत्मविश्वास आज कई गुना अधिक बढ़ गया है। इस इलाके में सामाज कल्याण के काम करने वाले इंदौर के नागरथ चैरिटेबल ट्रस्ट के सुरेश एमजी और उनकी टीम ने इन महिलाओं को इस काम से दो साल पहले जोड़ा था। आज ये महिलाएं और इनका परिवार आत्मनिर्भर होने के मायने समझने लगा  है।

 

समूह की महिलाओं ने झालर की कीमत केवल सौ रुपये ही रखी। इस एक झालर से उन्हें करीब 21 रुपये तक बच जाते हैं। ऐसे में समूह की एक महिला अगर सौ या दो सौ झालर बनाती हैं तो उनकी कमाई पांच हज़ार रुपये तक हो जाती है।  समूह की सभी महिलाओं को कोई बहुत ज़्यादा आमदनी तो नहीं हुई लेकिन उन्हें  कामयाब होने का रास्ता ज़रूर मिल गया।

बीते साल इन महिलाओं ने पांच सौ झालरें बनाई थीं। जो कुछ समाजसेवियों के माध्यम से कॉरपोरेट्स तक भी पहुंची। इस बार नागरथ चौरिटेबल ट्रस्ट के सुरेश एमजी ने अपने साथियों माधवेंद्र तिवारी और रंजना पाठक ने और भी ज्यादा प्रयास किये और झालरों की मांग बढ़ी।

इसका असर ये रहा कि महिलाएं पिछले करीब एक महीने से लगातार झालरें बना रहीं हैं और इस बार पांच हज़ार झालरें बना डालीं। झालरों की मांग अभी भी आ रही है लेकिन अब काम बंद हो चुका है। ऐसे में महिलाओं ने अगले साल के लिए एक योजना पर काम करना शुरु कर दिया है।

इन महिलाओं की इस मेहनत इंदौर के नेकदिल शहरियों का साथ भी मिला है। जिसका असर यह हुआ कि चोरल की झालर खरीदने के लिए करीब पचास किलोमीटर दूर शहर के दूसरे छोर विजय नगर से भी लोग यहां पहुंच गए और कॉर्पोरेट भी आगे आए। पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र की आयशर ग्रुप और मोयरा स्टील जैसी बड़ी कंपनियों ने भी सहयोग दिया और सैकड़ों की संख्या में ये झालरें खरीदी गईं।

आम नागरिकों के साथ जिले के सरकारी अधिकारियों ने भी इन महिलाओं का मनोबल ख़ूब बढ़ाया और देखते ही देखते हिचकिचाहट भरा एक प्रयास एक ठोस कामयाबी में बदल चुका है।

नागरथ ट्रस्ट के  सुरेश एमजी बताते हैं कि इन महिलाओं के इस समूह को आजीविका मिशन से जोड़ा गया है। कुछ और प्रयासों से  इन्हें करीब एक लाख झालरों के ऑर्डर मिल सकते हैं। ऐसे में आसपास के दूसरे गांवों की बहुत सी अन्य महिलाओं को भी इस  समूह के माध्यम से रोज़गार मिल सकेगा।



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