बड़ी कठिन है ये डगरः इच्छाशक्ति के सहारे आध्यात्म को पाने की राह है नर्मदा परिक्रमा


लोग नर्मदा परिक्रमा कर रहे हैं, अमरकंटक से खंभात की खाड़ी तक, रोजाना करीब तीस किमी चलते हैं लोग


ब्रजेश शर्मा ब्रजेश शर्मा
विविध Updated On :

बड़ी कठिन डगर है माई नर्मदा परिक्रमा की , कड़कड़ाती ठंड, उबर खाबड़ तो कहीं पथरीले रास्ते पर श्रद्धा और विश्वास नर्मदा के प्रति है, यह बिल्कुल वैसा ही जैसे किसी छोटे बच्चे के लिए मां ही उसकी दुनिया है।

यही वजह है कि देश और दुनिया में नर्मदा ही मात्र एक ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। चलने वाले ऐसे हैं जिनका भरा पूरा परिवार है, पर एक लालसा है – आध्यात्मिकता और अलौकिक सुख की,  इसलिए घर परिवार के सभी भौतिक सुख छोड़कर नर्मदा की परिक्रमा के लिए निकल पड़े हैं।

70 वर्षीय राघवेंद्र सिंह दतिया के रहने वाले हैं। नदी की परिक्रमा करते हुए वे कहते हैं कि लगभग दो माह से ज्यादा हो गए घर परिवार छोड़े हुए। नर्मदा के एक स्थान से शुरू परिक्रमा चलते चलते खंभात की खाड़ी जहां नर्मदा समुद्र में मिलती है उसके दूसरे छोर से वापस दूसरे तट पर आना व फिर चलने का यह सिलसिला वहां तक जहां से परिक्रमा शुरू की। वहां पर दूसरे तट पर पहुंचकर समाप्त करना तब परिक्रमा पूरी होने का संतोष। वे दोपहर के वक्त बरमान नर्मदा तट से निकले और किनारे-किनारे होते हुए शाम ग्राम गुरसी धर्मशाला पहुंचे ।

वह कहते हैं कि जिसमें भरपूर इच्छाशक्ति है वही नर्मदा की परिक्रमा कर सकता है, नहीं तो 28 कष्ट हैं ।नर्मदा माई के प्रति लोगों में श्रद्धा है और भय है और शायद यही वजह है कि नर्मदा परिक्रमा करने वालों को अमूमन कोई खास परेशानी नहीं होती। अकेले मध्यप्रदेश नहीं बल्कि महाराष्ट्र के दूर दराज इलाकों से भी लोग नर्मदा परिक्रमा के लिए आते हैं। चाहे महिलाएं हों या पुरुष। महाराष्ट्र के नासिक से मोहन राव 2 महीने पहले दिसंबर से परिक्रमा के लिए निकले हैं । कहते हैं कि शरीर के दोषों को दूर करने के लिए वह परिक्रमा कर रहे हैं।

अनगिनत परिक्रमा वासी परिक्रमावासी, जिनके हाथ में एक लाठी, जल के लिए एक डिब्बा और कंधे पर ओढ़ने – बिछाने का थोड़ा सा रोजमर्रा का सामान। एक कोई छोटा सा बैग वगैरह। जिसे लेकर ही वह रोज -रोज कोई 25 किलोमीटर कोई 25 से 30 किमी तो कोई 30 से 35 तो कोई 35 से 40 किलोमीटर तक का सफर तय कर रहे हैं।

कड़कड़ाती ठंड है इसलिए परिक्रमावासी देर सुबह से चलने का सिलसिला शुरू करते हैं और देर शाम तक बिना रुके थके चलते ही जाते हैं। कभी किसी पेड़ के नीचे तो किसी नर्मदा तट पर मिली धर्मशाला पर जाकर रात के कुछ घंटे बिताते हैं और फिर दिनचर्या के साथ पूजा अर्चना और नर्मदा को सब कुछ अर्पण करने की भावना के साथ फिर चलने सिलसिला शुरू हो जाता है।

नर्मदा कुछ है ही आस्था और विश्वास की नदी, कई किवदंती, मान्यताएं समेटे हुए। सरकार ने इसे जीवित इकाई का दर्जा जरूर दे दिया पर सरकार के ही कई नुमाइंदे कारिंदे परोक्ष अपरोक्ष रूप से इतना अवैध खनन नदी के अंदर जाकर मशीनों से कर रहे हैं कि अब नर्मदा के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह है। अफसोस तो यह है कि इनमें से कई भक्त बनकर नर्मदा माई की जय बोलते हैं पर रेत और पैसा शायद उनके आस्था ,विश्वास से ज्यादा मायने रखता है ।

नर्मदा ही है जहां परिक्रमावासी व दर्शन, स्नान करने वाले भक्त उसे मां-बाप की तरह मानते हैं । लोक शैली के गायन बंबुलिया में यह सुनने मिलता है तो लोग भाव विभोर हो जाते हैं। बंबुलिया के स्वर यह –

नर्मदा मैया ऐसी मिली रे ..
जैसे बिछड़े माई बाप रे ..
पहले बहती थी दूधन की धार रे..
अब बहे जल की धार रे ..
नर्मदा मैया हो ..

शायद इस तरह का विश्वास ही लोगों को नदी, पर्वत पेड़, जंगल, मिट्टी से जोड़े रखा है जिससे हमारी प्रकृति , पर्यावरण कुछ तो सहेजा सा बचा दिख रहा है ।



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