महूः लोकप्रिय 99 वर्षीय सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल ओंकार सिंह दिखित का निधन


मंगलवार की सुबह एक सादे समारोह में 99 वर्षीय सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल ओंकार सिंह दिखित का दाह संस्कार महू मुक्तिधाम में किया गया। कर्नल दिखित का निधन सोमवार की शाम लगभग 4.10 बजे सैन्य अस्पताल, महू में हुआ। 23 अगस्त को वे अपना सौवाँ जन्मदिन मनाने वाले थे।


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महू। मंगलवार की सुबह एक सादे समारोह में 99 वर्षीय सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल ओंकार सिंह दिखित का दाह संस्कार महू मुक्तिधाम में किया गया।

चीफ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत, पूर्वी कमान के मुख्य लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चौहान, स्टेशन कमांडर महू और 2/11 गोरखा राइफल्स की तरफ से उन्हें पुष्पचक्र से सम्मानित किया गया।

कर्नल दिखित का निधन सोमवार की शाम लगभग 4.10 बजे सैन्य अस्पताल, महू में हुआ। 23 अगस्त को वे अपना सौवाँ जन्मदिन मनाने वाले थे।

उनके भतीजे सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर संजय दिखित के अनुसार वे पिछले कुछ दिनों से सैन्य अस्पताल, महू में भर्ती थे और उम्र संबंधी बीमारियों के अनियंत्रित होने के कारण वे चल बसे।

लेफ्टिनेंट कर्नल ओंकार सिंह दिखित ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1942 में होलकर सेना के फर्स्ट इंदौर इन्फेंट्री (स्टेट फोर्सेज़) में कमीशन प्राप्त किया। आज यह भारतीय सेना की कुमाऊं रेजिमेंट की 15वीं बटालियन है। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल मंगल सिंह दिखित ने भी इस पलटन का नेतृत्व किया था और कर्नल ओंकार का बचपन इसी पलटन में गुज़रा था।

कमीशन प्राप्ति के बाद उन्होंने भारतीय सेना के सिख रेजिमेंट के छठे बटालियन (6 सिख) के साथ पूर्वी बंगाल में अपना अटैचमेंट किया। पलटन जापानी सेना से परास्त होकर बर्मा से लौटी थी और दूसरे सफल हमले की तैयारी में लगी थी।

इसके बाद वे अपनी पलटन पहली इंदौर इन्फेंट्री के साथ इराक और पर्शिया गये जहाँ भारतीय सेना की पाई फोर्स (पर्शिया एंड इराक फोर्स) तैनात थी।

आज़ादी के बाद वे पहली गोरखा राइफल्स की पहली बटालियन (1/1 जी आर) में ले लिये गये। कुछ समय इसी रेजिमेंट की दूसरी बटालियन (2/1 जी आर) के साथ बिताने के बाद वे 11 वीं गोरखा रेजिमेंट के पहली बटालियन (1/11 जी आर) में ट्रांसफर हो गये।

1950 के दशक में संयुक्त राष्ट्र शाँति सेना के साथ वे इंडो चाइना में पदस्त थे। 1961 में उनके छोटे भाई मेजर अजीत सिंह दिखित संयुक्त राष्ट्र शाँति सेना के साथ कांगो अफ्रीका में पदस्त थे । वहीं वे वीरगति को प्राप्त हुए।

ले. कर्नल बनने के बाद ओंकार सिंह ने अपनी रेजिमेंट की दूसरी बटालियन (2/11 जी आर) को स्थापित किया। इस बटालियन का युद्ध घोष (बैटल क्राई) “जय महाकाली आयो गोरखाली” कर्नल दिखित की ही देन है। अब यह 11 गोरखा रेजिमेंट के सभी पलटनों की बैटल क्राई है।

2/11 जी आर ने 1966 में मिज़ो विद्रोह के दौरान एक अहम भूमिका निभाई थी और विद्रोहियों को परास्त किया था। दिखित साहब की फील्ड मार्शल मानेकशॉ से भी अच्छी मित्रता थी हालाँकि मानेकशॉ उनसे सीनियर थे और 8वीं गोरखा रेजिमेंट से थे।

1971 बांग्लादेश युद्ध के दौरान और बाद में दिखित जी एक युद्ध बंदी कैंप में इंटेलिजेंस अफसर के रूप में पदस्थ थे। उन्होंने बताया था कि पाकिस्तानी युद्ध बंदियों ने अनुरोध किया था कि उन्हें अगर पाकीज़ा और मुग़ल ए आज़म दिखा दिया जाये तो वे अतिरिक्त 6 महीने युद्ध बंदी बनकर रहने को तैयार थे।

तत्कालीन मध्य कमान के आर्मी कमांडर विक्टोरिया क्रॉस विजेता ले. जनरल पीएस भगत के आदेश पर पाकिस्तानी युद्ध बंदियों को युद्ध बंदी कैंप में बिना एक भी अतिरिक्त दिन बिताये ये दोनों फिल्में दिखायी गयीं।

सत्तर के दशक के शुरुआत में फ़ौज से रिटायर होने के बाद दिखित अपने परिवार के साथ नाइजीरिया चले गये जहाँ लगभग दो दशकों तक उनकी पत्नी और उन्होंने स्कूल टीचर बनकर काम किया। वहीं पर पत्नी के देहांत के बाद वे महू वापस आ गये, उनकी बेटियाँ विदेशों में नौकरी करने चली गयीं थीं।

लगभग 3 दशक वे महू में ही रहे। उनके मिलनसार एवं मददगार व्यक्तित्व के कारण सिविल और फ़ौज में बहुत लोकप्रिय बने। आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवारों के कई बच्चों को उन्होंने शिक्षा प्राप्ति में सहायता दी।

उनकी छोटी बहन स्वर्गीय प्रोफेसर हेमलता दिखित इंदौर और मालवा की एक जानी मानी शिक्षिका थीं। वे अपने पीछे अपनी बहनें, बेटियाँ, पोता, परपोता, भतीजे और भतीजियाँ छोड़ गये हैं।