मप्र उपचुनाव और बिहार में प्रदर्शन से मनोबल कमज़ोर, कांग्रेस में बिखराव की आशंका


उपचुनाव की हार के बाद मध्यप्रदेश कांग्रेस की जिला इकाईयों में हालात ठीक नहीं बताए जा रहे हैं। हार के बाद यहां नेताओं का मनोबल  डगमगाया हुआ है। उपचुनावों के दौरान कांग्रेस के बीजेपी पर लगाए गए किसी भी आरोप को जनता ने गंभीरता से नहीं लिया है। ऐसे में इन नेताओं के सामने आगे संघर्ष करने की राह भी धुंधली नज़र आ रही है।  


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भोपाल। नवंबर का महीना आधा गुज़र चुका है और केंद्र और प्रदेश में बीजेपी की सियासी मुश्किलें भी खत्म हो चुकी हैं। इस बीच पहले से ही मुश्किल में फंसी कांग्रेस की मुश्किलें अब और भी बढ़ चुकी हैं। विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल अब जहां खुलकर पार्टी नेतृत्व की आलोचना कर रहे हैं तो वहीं राजद के शिवानंद तिवारी बिहार में कांग्रेस पार्टी को महागठबंधन पर बोझ बता रहे हैं।

इसके साथ ही मध्यप्रदेश में पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। यहां कांग्रेसी नेताओं को पार्टी में और अधिक बिखराव का डर सता रहा है। वहीं शीर्ष नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के निष्क्रियता को लेकर भी कांग्रेसियों में निराशा है।

उपचुनाव की हार के बाद मध्यप्रदेश कांग्रेस की जिला इकाईयों में हालात ठीक नहीं बताए जा रहे हैं। हार के बाद यहां नेताओं का मनोबल  डगमगाया हुआ है। उपचुनावों के दौरान कांग्रेस के बीजेपी पर लगाए गए किसी भी आरोप को जनता ने गंभीरता से नहीं लिया है। ऐसे में इन नेताओं के सामने आगे संघर्ष करने की राह भी धुंधली नज़र आ रही है।

उपचुनावों में  बीजेपी को भीतरघात का खतरा बताया जा रहा था लेकिन ज्यादातर सीटों में भीतरघाट कांग्रेस में ही हो गया। इस तरह  कांग्रेस के नेता संगठनात्मक रुप से बेहद ही कमजोर साबित हुए हैं। मतदान के ठीक पहले तक नेताओं और विधायकों का कांग्रेस छोड़ना जारी रहा और बाद में करारी हार। यही वजह है कि पार्टी का कमजोर संगठनात्मक ढांचा अब और भी जर्जर नज़र  रहा है।

कांग्रेस का यह संगठन ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने भी कमज़ोर साबित हुआ। जिनके साथ कांग्रेस के हज़ारों कार्यकर्ता और सैकड़ों नेता बीजेपी में शामिल होते रहे और प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व उन्हें रोकने के लिए कुछ खास नहीं कर सका। कार्यकर्ताओं के मुताबिक पार्टी में नेताओं और कार्यकर्ताओं का संवाद न होना नुकसान की एक बड़ी वजह है और हार के बाद तो कांग्रेस नेता जैसे चुप ही हो गए हैं। ऐसे में कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने वाला फिलहाल कोई नजर नहीं आ रहा है।

पीसीसी अध्यक्ष कमलनाथ के बारे में पहले ही बीजेपी यह प्रचारित कर चुकी है कि वे चुनाव के बाद वापस लौट जाएंगे और अपने दूसरे कामों में लग जाएंगे। अब यह कितना सच साबित होता है यह आने वाले दिनों में पता चलेगा। इंदौर के एक कांग्रेसी नेता बताते हैं कि इस समय कांग्रेस संगठन को सक्रिय, अनुभवी, ज़मीनी और संगठन की समझ रखने  वाले नेताओं की ज़रूरत लेकिन फिलहाल मौजूद नेताओं में से ऐसा कोई नज़र नहीं आ रहा है। ऐसे में कार्यकर्ताओं को बचाए रखना मुश्किल काम हो चुका है। वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने भी कांग्रेस पार्टी में संगठनात्मक ढांचे पर चिंता जताई है।

कपिल सिब्बल

मध्यप्रदेश के अलावा बिहार में कांग्रेस के प्रदर्शन ने भी यहां के नेताओं को निराश किया है। पार्टी ने सत्तर प्रत्याशी उतारे और इनमें से केवल 19 ही जीतकर आए हैं।

शिवानंद तिवारी

बिहार में  महागठबंधन की सरकार न बन पाने की एक बड़ी वजह कांग्रेस पार्टी का यह प्रदर्शन भी है। इसे लेकर राजद नेता शिवानंद तिवारी भी कांग्रेस से ख़ासे नाराज़ हैं। उन्होंने कांग्रेस पार्टी को को महागठबंधन पर बोझ बताया है।

मध्यप्रदेश के उपचुनावों में गांधी परिवार की सक्रियता न नज़र आने से भी नेता और कार्यकर्ता निराश रहे हैं। कार्यकर्ताओं  के मुताबिक 2018 की तरह अगर राहुल गांधी एमपी आते तो उपचुनावों में सफलता का प्रतिशत बढ़ जाता। हालांकि राहुल गांधी ने बिहार चुनावों में भी खास सक्रियता नहीं दिखाई।

शिवानंद तिवारी ने अपने बयान में राहुल गांधी की भी तीख़ी आलोचनी की है, उन्होंने कहा…

राहुल गांधी महज तीन दिनों के लिए प्रचार में आए और प्रियंका गांधी आईं ही नहीं। यहां चुनाव प्रचार के लिए उन लोगों को भेजा गया जिन्हें बिहार चुनाव की कोई जानकारी नहीं थी। यह सही नहीं है।  चुनाव प्रचार जब अपने चरम पर था, तब राहुल गांधी शिमला में प्रियंका के घर पर पिकनिक कर रहे थे, पार्टी को क्या ऐसे चलाया जाता है।



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