अंग्रेजों के जुल्मों को बयान करना आज भी बहुत मुश्किल है


99 वर्षीय राम रतन शुक्ला ने अपने सम्मान समारोह में कहा कि मैंने आजादी की लड़ाई में कोई हिस्सा नहीं लिया लेकिन अंग्रेजों के सितम को काफी करीब से देखा और भोगा भी है।


अरूण सोलंकी अरूण सोलंकी
इन्दौर Published On :
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महू। आजादी के पूर्व अंग्रेजों ने जो जुल्म भारतीय पर किए उसे आज भी बयान करना मुश्किल है। कैसे थे वे भारतीय जो स्वयं उस जुल्म को सहते रहे जिसकी आजादी का स्वाद हम चख रहे हैं। उसे याद करते ही आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

यह बात रंगवासा निवासी 99 वर्षीय राम रतन शुक्ला ने अपने सम्मान समारोह में चर्चा करते हुए कही। शुक्ला ने कहा कि मैंने आजादी की लड़ाई में कोई हिस्सा नहीं लिया लेकिन अंग्रेजों के सितम को काफी करीब से देखा और भोगा भी है।

शुक्ला ने कहा कि हकीकत में उनका राज था। जिस रास्ते से वह निकल जाते वह रास्ता उनका हो जाता। फिर चाहे हमारे खेतों में फसल ही खड़ी क्यों ना हो। उनके आने भर की खबर से हम घरों के अंदर छुप जाते।

उस जमाने में और आज के जमाने में जमीन-आसमान का अंतर है। तब न बोलने की आजादी थी और न तो कुछ करने की। आज हम खुशनसीब हैं कि आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं।

शुक्ला ने कहा कि लेकिन आज के दौर को देखकर भी दुख होता है। उस समय हम एक-दूसरे की फ्रिक और सम्मान करते थे। परिवार बड़े होने के साथ एकजुट रहते थे। हर कोई एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होता था। जो आज के दौर में देखने को नहीं मिलता। वह दौर अंग्रेजों के जुल्म का था और आज का दौर अपनों के सितम का है।

99 वर्षीय शुक्ला 12 जुलाई 1959 में वेटरनरी कॉलेज की बिल्डिंग के उदघाटन के समय भी मौजूद थे। पशु चिकित्सा महाविद्यालय द्वारा शुक्रवार को उनका सम्मान किया गया। कार्यक्रम के अध्यक्ष अधिष्ठाता डॉ. मुकेश मेहता ने कहा कि स्वतंत्रता हमें एकाएक नहीं मिली अपितु इसे पाने के लिए हज़ारों रणबांकुरों ने अपने प्राणोत्सर्ग किये हैं।

प्रारंभ में डॉ. मुकेश मेहता ने शॉल और श्रीफल के द्वारा शुक्ला का अभिनंदन किया। संचालन डॉ. संदीप नानावटी ने किया और आभार डॉ. आरके जैन ने माना।