आदिवासी इलाकों में उत्सव के रूप में मनाया गया इंदल, समाजजनों ने किया पूजन


इंदल के कारण गांव में उत्सवी माहौल रहा। ग्रामीण व रिश्तेदार मन्नतधारी सहित बड़ी संख्या में लोग इकठ्ठे हुये। रात में पेड़ के नीचे कलम की ही टहनियों को ईष्ट देवता के पास स्थापित कर पूजा-पाठ की गई। ढोल-मांदल की थाप पर खूब नाच-गाना हुआ। आयोजन स्थल पर मेले सा माहौल रहा।


kantilal-karma कांतिलाल कर्मा
खरगोन Published On :
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खरगोन। जिले के आदिवासी इलाकों में इन दिनों इंदल की धूम मची हुई है। इंदल को आदिवासी समाजजन पूरी शिद्दत से उत्सव के रूप में मनाते हैं। पर्व के तहत सिरवेल में शनिवार रात इंदल देव की स्थापना हुई, इसके बाद रातभर पूजन-अर्चन का दौर चलता रहा।

इंदल के कारण गांव में उत्सवी माहौल रहा। ग्रामीण व रिश्तेदार मन्नतधारी सहित बड़ी संख्या में लोग इकठ्ठे हुये। रात में पेड़ के नीचे कलम की ही टहनियों को ईष्ट देवता के पास स्थापित कर पूजा-पाठ की गई। ढोल-मांदल की थाप पर खूब नाच-गाना हुआ। आयोजन स्थल पर मेले सा माहौल रहा।

सरपंच विकास सेनानी ने बताया नवाई, दिवासा व भगोरिया की तरह इंदल का भी इस समाज में विशेष महत्व होता है। इंदल आदिवासियों की परंपरागत आस्था का प्रतीक होता है।

इंदल पांच साल में आता है। लिहाजा प्रतिवर्ष किसी न किसी गांव में पांच साल का चक्र चलता रहता है। सिरवेल में 12 से अधिक गांवों के लोग शामिल हुए।

समाजजनों ने बताया कि इंदल पर आदिवासी समाज के लोग अपने इष्ट देवता से मन्नत मांगते हैं। घर में सुख-शांति रहे, बीमारी का प्रकोप न रहे, खूब बारिश हो और फसल अच्छी पके आदि मन्नतों में शामिल होती है।

इसके बाद जब कोई विपदा नहीं आती है तो आदिवासी मान लेते हैं कि उनकी मन्नत पूरी हो गईं। किसी व्यक्ति की मन्नत पूरी होने की सूचना गांव के पटेल को दी जाती है। इस पर इंदल का आयोजन किस दिन करना है, यह पटेल तय करता है।

मन्नतधारी व्यक्ति के परिजन शादी की तरह इंदल का न्योता देने गांव के लोगों व रिश्तेदारों के यहां जाते हैं। वे आमंत्रितों के दरवाजों की डेल पर चावल-हल्दी डालकर इंदल मनाने की मौखिक सूचना देकर आते हैं।



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